Tuesday, June 6, 2017

दधीचि तर्पण : राम लोचन ठाकुर

मैथिली आंदोलनक अग्रिम पांतिमे प्रतिबद्ध योद्धा बनि डटल रहनिहार बाबू भोलालाल दास मैथिलीक सम्मान आ उत्थानक लेल अपन सर्वस्व झौंकि देने छलाह । ओ सांस्कृतिक चेतनाक स्तर पर मैथिल केँ व्यवहारिक रूपसँ पहिलबेर एकबद्ध केनिहार व्यक्तिमे सँ एक छलाह । प्राथमिक शिक्षासँ ल’ के विभिन्न विश्वविद्यालय धरि मैथिलीक स्वीकृतिक लेल कएल गेल हुनक संघर्ष अविस्मरणीय अछि । हम सब मैथिल हुनक ऋणि छी आ रहब । हुनका आ हुनक विचार आ काजकेँ (जे बहुत बेसी महत्वक छै) जाननय हमरा सब लेल आवश्यक अछि । एही भावनाक संग हुनका पर केन्द्रित किछु आलेखआ उपलब्ध भेला पर हुनकर लिखल किछु सामग्रियो प्रस्तुत करबाक चेष्टा रहत । एहि क्रममे ई दोसर आलेखक प्रस्तुति थिक ।   
एहि श्रृंखला मे बासुकीनाथ झाक पहिल आलेख परिचयात्मक छल । रामलोचन ठाकुरक लिखल ई दोसर आलेख विचार प्रधान छैक । एहिमे भोलालाल दासकेँ स्मरण करैत मैथिली मिथिलाक चिंतासँ ओतप्रोत कतेको आरो प्रसंग आयल छैक । लेखकभोलालाल दासक व्यक्तित्व आ कृतित्त्व सँ जतबा प्रभावित छथि ततबा मैथिलीसँ जुड़ल इतिहासक कतेको प्रसंग आ मैथिलक सामान्य प्रवृत्तिसँ खिन्नो छथि।
एहि लेखमे भोलालाल दासतँ भेटता लेकिन आनो किछु नवीन आ बहसक उपयुक्त जानकारी वा दृष्टिकोण भेटि सकैत अछि । जेना एहिमे लेखकक एकटा धारणा व्यक्त भेल छन्हि - जे रवीन्द्रनाथक लीखल ‘जन गण मन’ विद्यापतिक लिखल ‘जय जय भैरवि’ गीतक अनुसरण करैत लिखल गेल छैक ।  
ई स्पष्ट कए देनए आवश्यक अछि जे एहि आलेखक प्रस्तुतिसँ ई अर्थ नहि लगाओल जाए जे ‘मैथिली मंडन’ एहि आलेखमे व्यक्त प्रत्येक विचार वा धारणासँ सहमत अछि। एहि आलेखमे किछु बात निश्चित रूपें आलोच्य छैक। 
प्रस्तुत दोसरो आलेख हैदराबाद सँ प्रकाशित देसिल बयना स्मारिका (मई 2017) सँ साभार लेल गेल अछि ।*  

दधीचि तर्पण
राम लोचन ठाकुर
हमरालोकनि तर्पण करैत छी । प्रत्येक वर्ष करैत छी । मुदा जाहि विभूति लोकनिक प्रसादात हमरालोकनिक अस्मिता-अस्तित्व, तिनका बड़ सहजताक संग बिसरि जाइत छी । वस्तुतः हमरालोकनिक जातिए तेहने अछि । हमरालोकनि अपन मूलकेँ बिसरि अन्तर्राष्ट्रीय होएबाक कल्पना करैत छी, सपना देखैत छी । विश्वक प्रथम गद्यग्रंथ वर्णरत्नाकरतकलनि  महामहोपाध्याय हरप्रसाद शास्त्रीक शिष्य। प्रकाशित कएलक कोलकाताक एशियाटिक सोसाइटी । कविपति विद्यापति रजनी-सजनी लिखैत छथि, तेँ हुनको मोजर नहि देल । धन्यवादक पात्र छथि नागेन्द्र नाथ गुप्त महाशय जे मात्र गीतक संग्रहेटा नहि केलनि, तकर व्याख्याक संग बसुमतीसँ प्रकाशितो करबओलनि । विद्यापति सिनेमा बनल बंगलामे, 1937 ई. मे । ऋषि अरविन्द सर्वप्रथम ओकर अंग्रेजी अनुवाद केलनि । रवीन्द्रनाथ पदावलीक नकल भानुसिंहेर पदावलीलिखलनि । हिनक जन-गन-मन....गीत विद्यापतिक जय-जय भैरवि....क नकल थिक, सेहो बोध हमरा लोकनिकेँ नहि भेल । बंगभाषा ओ साहित्यक लेखक दीनेश चन्द्र सेन कहैत छथि जे बंगलाक सकल श्रेष्ठ कविक गुरु छथि विद्यापति । बंगला लिपिक उत्पत्तियो ओ मिथिलाक्षरसँ मानैत छथि । किन्तु हमरालोकनि एहन विलक्षण मिथिलाक्षरकेँ बिसरि देवाक्षरक अनुगामी भेल छी । कतेक कचोटक बात छैक जे 24 याजेन नाम आ 16 योजन चाकर एक भूखंड, जकरा इतिहास-पुराणमे विख्याता कहल गेल छैक, जाइठाम चारिटा दर्शनक रचना भेल छैक - तकरो बिसरा देल । विश्वक प्रथम गणतंत्रक जन्म जाइठाम भेलैक, जाइठाम शुक्ल यजुर्वेदक रचना भेल, सामवेदक रचना भेल, गायत्री मंत्रक रचना भेल आ कामशास्त्रक रचना भेल - तकरो बिसरऽमे हमरा लोकनिकेँ कनिञो कचोट नहि भेल । कोशीक उत्पात सहितो तकर व्यथा-कथा लिखबाक चेतना नहि भेल - लिखलनि एक बंगाली विभूति भूषण मुखोपाध्याय । अयाची सन्धाने सेहो हिनके कृतित्व छनि । मणिपद्म चर्च कएने छथि विभूति बाबू आ सतीनाथ भादुरीक, मुदा हुनकोसँ पूर्व पुणेमे अपन घर बना तकर नाम मिथिलारखलनि शरदिन्दु बन्दोपाध्याय । ई मुंगेरमे रहैत छलाह आ अन्तमे स्वामी विवेकानन्द जाहि रामायणकेँ सीताक चरित्रक आदर्श उपाख्यान कहने छथि, तिनको जन्म तँ मिथिलेमे भेल छल । आदिकवि वाल्मीकियोकेँ सीतासँ गप करबाक लेल महापंडित हनुमानसँ मानुसी भाषा बजओने छथि - अवश्यमेव वक्तव्यं मानुसी वाक्यमर्थवत्।आ एही परम्पराक अग्रिम कड़ी छलाह भोला बाबू, भोला लाल दास। ई अपन अस्थि-मज्जाये नहि, सम्पत्तियो बेचि मैथिलीक कल्याणमे लगा देलनि - हमरा लोकनि आइ तिनको मोन रखबाक लेल तैआर नहि । हम एकरा अपन सौभाग्ये बुझैत छी जे एक बेर हुनक दर्शन भेल छल - बाबू साहेब चौधरीक प्रेसमे ।
1964 ई. मे मैट्रिक पास कए कोलकाता आएल रही । बयस थोड़ छल, तेँ प्राइवेटे नोकरीक भरोस । सरकारी नोकरी तँ भेटल 1969 ई. मे । किन्तु मिथिला-मैथिली पहिने भेटि गेल । तहिया कोलकातामे बहुतो मैथिली-सेवी संस्था छलैक । बड़ काज भेल छैक एहिठामसँ । जँ ब्रजमोहन ठाकुरक प्रयास आ आशुतोष बाबूक सदाशयता नहि रहितनि, कीर्त्यानन्द सिंहक आर्थिक सहयोग नहि रहितनि, तँ जानि ने मैथिली कतय रहितथि! कलकत्ता विश्वविद्यालयमे 1919 ई. सँ मैथिली पढ़ाओल जाइछ, बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय 1933 ई. मे किरण जीक प्रयासेँ मैथिलीकेँ मान्यता देलक । विचारणीय थिक जे जँ कलकत्ता विश्वविद्यालय एकरा स्वतंत्र भाषा नहि मानने रहैत तँ साहित्य अकादेमी किंवा संविधानमे स्थान पओनाइ कि सहज छल? स्वभावतः यात्री जी कोलकाताकेँ मिथिलाक लघु संस्करण कहने छथि ।
1969 ई. मे नोकरी भेटल आ कॉलेजमे नाम लिखाओल । कोनो सभामे सुनने रहियैक जे छात्रक अभावमे मैथिली नहि पढ़ाओल जाइत छैक, से मैथिली राखल । एकमात्र विद्यार्थी । आ अनुभव आरम्भ भेल अपन विभूति लोकनिक कृतित्व अनुसन्धान । एही क्रममे भेटला मैथिली दधीचि बाबू भोला लाल दास । किन्तु, ई कोन भोला थिकाह! नान्हिएटामे सिखाओल गेल छल जे ब्रह्मा सृष्टिकर्ता छथि, विष्णु पालनकर्ता आ भोला संहारकर्ता । मुदा हिनकामे तँ तीनू देवक रूप साक्षात!
मोन पड़ैछ किरण जीक श्रद्धांजलि । 1937 ई. मे सरिसवमे मैथिल महासभाक अधिवेशन   रहैक । भोला बाबू मैथिली पोथी प्रकाशनार्थ आर्थिक सहायताक अपील केने छलथिन । बस, आरम्भ भेल हुनक फज्झति । फज्झतिकर्ता लोकनिक नेता छलाह राजपंडित बलदेव मिश्र । जयगोविन्द मिश्र मैथिली पोथी प्रकाशनार्थ मैथिली साहित्य परिषदकेँ एकटा कपड़ा देलथिन । भोला बाबू तकरा महाराजा कामेश्वर सिंहक कर-कमलमे अर्पित कएलनि । महाराजक उदारता मैथिलीक बेरमे विपरीत रूप धारण कएलक । मात्र अढ़ाइ सए भेटलैक परिषदकेँ । जँ बजारेमे बेचल जाइत तँ एकर चारि बड़ अवश्य अबितैक ।
इएह छलाह भोला बाबू! सत्ते ओ भोला छलाह । निर्विकार भावेँ अविरल-अविराम विषपान करैत रहलाह अपन भू-भाषाक अस्मिता-अस्तित्व रक्षार्थ । प्रतिष्ठित हिन्दीक लेखक, ओ हिन्दीयोमे लिखैत रहलाह आ ताइसँ जे पाइक आमद भेलनि तकरा मैथिलीक पोथी छपेबामे लगओलनि । मोन पड़ैत छथि बंगलाक विख्यात रचनाकार शरतचन्द्र - प्रतिष्ठान जते पुरान, जते पवित्र, जते सनातन किएक ने हो, मनुक्खसँ पैघ नहि होइछ ।भोला बाबू सेहो एही मतक माननिहार छलाह । वस्तुतः मनुक्ख आइ धरि जते चीजक आविष्कार कएलक अछि, भाषाक स्थान ताहिमे सबसँ ऊपर छैक । सत्य कही तँ भाषाए ओ चीज थिक जे मनुक्खकेँ मानवता प्रदान करैछ । प्रार्थनासँ साहित्य-सर्जना धरि भाषाएपर निर्भर अछि । यद्यपि भाषा साध्य नहि, साधन थिक, जकरा माध्यमे मिथिला-मैथिलीक कल्याण कएल जा सकैछ। मुदा अपसोच जे बादक नेतालोकनि एहि बातकेँ सहजतासँ बिसरा देलनि । परिणाम समक्षे अछि । वस्तुतः इतिहासक पन्ना जँ उनटा कए देखल जाए तँ ई बात स्पष्ट भऽ जायत जे प्रत्येक महान पुरुष अपन जीवन कालमे समसामयिक एक वर्ग द्वारा आलोचित-अपमानित होइत रहलए; मुदा संगहि, ठीक एकर समानान्तर एक आओर वर्ग द्वारा पूजित-सम्मानित सेहो । उल्लेखनीय जे 1937 ई. मे भारतीनामक पत्र प्रकाशित करय लगलाह तँ सम्पादन करबाक लेल भुवन जीकेँ अनुरोध कएल । भुवन जी जखन नहिं गछलथिन, तँ अपने ओ काज कएलनि । किन्तु विडम्बना देखू जे पीठेपर भुवन जी विभूतिबहार कएलनि, जकर  पहिले अंकमे लिखलनि, ‘मैथिली साहित्य परिषदकायथक संस्था थिक आ भारतीथिक कैथिन । किन्तु भोला बाबूक व्यक्तित्व आ कृतित्वसँ परिचित लोक सभ हिनका मैथिली दधीचिक सम्मान देलक ।
मोन पड़ैत अछि भोला बाबूक अनमोल अवदानक कथा । जँ भोला बाबू नहि रहितथि तँ की पटना विश्वविद्यालय मैथिलीकेँ मान्यता देने रहैत? पाइ के देलथिन, ताइसँ महत्त्वपूर्ण थिक जे प्रयास के केलनि । भोला बाबू प्रत्येक अभावक पूर्त्ति लेल सतत तत्पर रहैत छलाह । मैथिली पढ़ाइ आरम्भ भऽ गेल मुदा पोथी नहि अछि । भोला बाबू अनति विलम्ब तकर पूर्त्ति कऽ दैत छलाह । ओ कतेक लिखलनि, कोन-कोन भाषामे लिखलनि, तकर आइयो निस्तुकी नहि भऽ सकल अछि । कमलेश झा कहियो कोलकातामे रहैत छलाह, आइ दरभंगा धयने छथि; हिनक दृष्टिमे ई सभ बात रहैत छनि । भोलालाल दास रचनावलीक प्रथम खण्ड ई प्रकाशित कएलनि 2008 ई.मे । लोकार्पण लेल हम कोलकातासँ गेल छलहुँ । विद्वानलोकनिक जे विचार सुनल, अपनो ओतेक नहिं जानल छल । अपन पयस्विनीमे सुमन जी लिखैत छथि–
जनिका नहि परबाहि आहि क्यो कहओ बताहो ।
मैथिलीक हित  लड़बे उचित   पहिरि सन्नाहो ।।
जे विधान-विद्वान, सुकविसम्पादक, वक्ता ।
उभय भारती-मिथिला-हित नित जे अधिवक्ता ।।
          दासमैथिलिक लालछथि जे अमोल भोला भला ।
माथ मातृभाषाक नहि झुकओ, कटओ बरु निज गला ।।’  
भोला बाबू अपने लिखैत छथि - केवल सुमने जी नहिं, प्रकारान्तरे मैथिली स्वीकृति-संघर्षक सफल सेनानी (वस्तुतः एक साधारण सेवक) रूपेँ स्व0 डॉ. उमेश मिश्र, राय बहादुर जयानन्द कुमर, ठाकुर सूर्य नारायण सिंह, पं. गिरीन्द्र मोहन मिश्र, स्व. कुमार गंगानन्द सिंह, प्रो. हरिमोहन झा, श्री अमर जी आदि अनेकानेक व्यक्ति एहि प्रकारक भाव हमरा वा परिषदक विषयमे व्यक्त कऽ चुकल छथि । कतेक गोटाकेँ मना कएल जाइत । एहि विषयक हम चर्चो नहिं करितहुँ, कारण ई आत्मप्रशंसे थिक, मुदा मैथिल समाजमे एहनो एक गुट भेल अछि जे डॉ. सुधाकर झा शास्त्रीकेँ अपना संस्मरण वार्तामे हमरा नामक तँ कथे नहि, ‘मैथिली साहित्य परिषदक ओहि विमल यशक चर्चो मात्र नहि करए देलकनि । परिषद रूपी पूर्ण चन्द्रक एहि राहुगणहिक अनुरोधे ई धर्म-संकट लिखल गेल ।
भोला बाबूक मादे लिखय बैसल छी । किछु प्रश्न छैक जे की लिखी आ की नहिं लिखी । जँ हिनक व्यक्तित्व आ कृतित्वक मादे सांगोपांग लिखी तँ एक महाभारते भऽ जायत । ओनहुना हिनक समस्त कृतित्वक ज्ञानो नहिञे अछि । ई एक नामी ओकिल छलाह, यशस्वी लेखक छलाह, आदरणीय सम्पादक छलाह । कथा-कविता-निबन्ध, पाठ्य-पुस्तक - सभ लिखैत छलाह । नीक आयोजक छलाह । विद्यापति जयन्ती हिनके आरम्भ कएल थिक । मुदा जँ एक वाक्यमे कही तँ ई खाँटी मैथिल छलाह । मैथिलीक प्रति हिनक अनुराग तँ छलहे, मिथिलाक्षरोक प्रति कनिञो थोड़ नहि । एकठाम ई लिखैत छथि - भारतवर्षहुमे एक लिपिक आन्दोलन होइत-होइत अनेकानेक अस्थिरो लिपि स्थिर भऽ गेल, केवल एकटा मैथिलिए लिपि एहन रहि गेल जे मैथिल जातिक उदासीनतासँ अपना अन्तिम घड़ीक प्रतीक्षा कऽ रहल अछि । परिषदक ओ मिथिलाक्षरांकन समितिक ई प्रधान कर्तव्य अछि जे एकरा स्वीकृतिक हेतु बद्धपरिकर भऽ जाए किन्तु एहि आयासमे सफलता तखनहि हएत जखन श्रीमान् मिथिलेशो मैथिलीक नेतृत्व ग्रहण करथि । की मिथिलाक्षरक प्रेमी राजपंडित श्रीयुत बलदेव मिश्रजी आदि महानुभाव एहि दिसि किछु ध्यान देताह?’ 
ध्यान देबाक बात थिक जे बलदेव मिश्र हिनक जे फज्झति केने छलथिन, से हम पहिनहि लिखि चुकल छी, किन्तु तिनको प्रति हिनक कथन कते संयमित छनि! ज्ञात भेल अछि जे मैथिलीक वरिष्ठ कवि-साहित्यकार गंगेश गुंजन मिथिलाक्षरक विरुद्ध आ देवाक्षरक पक्षमे अपन मत प्रकाशित केलनिहें । एकरा विडम्बना नहि तँ आर की कहल जायत? कहियो पण्डित गोविन्द झा कहने छला जे जय-जय भैरवि....विद्यापतिक रचना नहिं छनि ।वस्तुतः मैथिलीक विरोध मैथिले द्वारा वर्तमानमे संक्रामक रोगक रूप लेने जा रहल अछि । हिन्दी पटरानी थिक, मेवाक आसमे तकर सेवा कएनिहारक अभाव नहि, अपन मैथिली रचनाकेँ हिन्दी अनुवाद कए प्रकाशित करओनाइ फेसन भऽ गेल अछि, मुदा जननी जन्मभूमिच स्वर्गादपि गरीयसीकेँ केना बिसरल जायत? ई की मनुष्यता होयत? भोला बाबूकेँ एकर बोध छलनि । तेँ ओ माँ बदलि डाइनक पूजार्चनाक विरोधी छला । मिथिलाक्षरक प्रचारोपायजे प्रथम खण्डक पृष्ठ 49 पर देल गेल अछि, से देखि कोनो मैथिली-प्रेमीक सूप सन छाती भऽ जेतनि - ई विश्वास हमरा अछि । धन्यवादक पात्र छथि कमलेश जी । मोन पड़ैत अछि मधुप जीक श्रद्धांजलि - 
दिवंगत मिथिलाक भोला पूज्य भोलालाल दासक संस्मरणमे निरन्तर
नदनदी निर्माणक युगल-निज-नयन-नीरद-नीर निकरक विन्दुनिर्मित हार
निसर्गोद्भव भवक वैभव-भक्ति-मण्डल-मण्डित
मानस मधुप मम समर्पित करइत मङै अछि –
फेर ओहने आबि भोला अपन भोलापन देखबिते,
भेद-भावक दुर्गकेँ ओहिना ढहबिते,
अबुधवान्धववर्गकेँ गंगा नहबिते हमर भाषाकेँ चराँते बुझनिहारहुँकेँ सिहबिते,
राजनीतिक पाँकमे फाँसल हुनक रक्षित अपन भाषाक शकटी केर करथि उद्धार ।
जाहिठाम सुमन जी, मधुप जीक एहन विलक्षण भावना, ताहिठाम आनक बाते की हो!   भोला बाबूक आर एक पोथी हमरा प्राप्त भेल अछि, ओ थिक बाबू भोलालाल दास  रचनावलीक दोसर खण्ड । एकरो सम्पादक छथि, फूलचन्द्र झा प्रवीण । अर्थ सहयोग छनि शारदानन्द दास परिमलकेर । एहि खण्डमे मैथिली सुबोध व्याकरणमैथिली व्याकरण प्रबोधअछि । भोला बाबूक तप-साधनाकेँ मोन पाड़ैत यादि अबैत छथि यासेर अराफात -
‘You ‍are‍ the ‍generation ‍that‍ will
reach the sea and hoist the flag
of‍ Palestine ‍over‍ Tel‍ Aviv.’
रवीन्द्र ठाकुर कहैत छथि –
नागिनीरा चारिदिके फेलितेछे विषाक्त निःश्वास
शान्तिर ललित वाणी सोनाइबे व्यर्थ परिहास,
          विदाइ नेवार आगे
ताइ डाक दिये जाइ
दानबेर साथे संग्रामेर तरे
प्रस्तुत हतेछे जारा प्रति घरे-घरे।’
बंगलाक विख्यात कवि विष्णु देक शब्दमे –
तोमार ओ दीप्ति मुक्ति पाबेइ आमार चित्ते
कोनो तरुण तमाले,
एक दिन, एक राते कोनो एक काले।
जानि नहि से दिन, से राति, से काल मिथिलामे कहिया आओत! किन्तु भोला बाबूक ई कामना-भावना अवश्ये छलनि आ ताहि लेल ओ सतत संघर्ष करैत रहलाह । किन्तु मिथिला- मैथिलीक जे वर्तमान अवस्था देखि रहल छी, ताहिमे तँ ई बात सोचलो नहिं जा सकैत अछि । मैथिलीक सम्मान परदेशेमे भेटलैक आ आइयो ई परदेशेपर निर्भर अछि, खाहे कोलकाता हो वा हैदराबाद-सिकन्दराबाद । भनहिं पुरस्कार सबटा दरभंगा-मधुबनीए धरि सीमित हो । मैथिलीक अधिकांश साहित्यकार मगह-दिल्ली धेने छथि । बहुतोक घरक भाषा हिन्दी अछि । आइ ने तँ भोला बाबू छथि, आ ने मैथिली आ हिन्दीलिखनिहार जनकवि यात्री जी । तखन तँ अपन श्रद्धांजलिए टा दऽ सकैत छियनि एहि संकल्पक संग जे आजीवन मैथिली लिखैत रहब, बजैत रहब ।
 भोला तँ भोले छलाह, कतबा कही कमाल।
एक शब्दमे जँ कहीमैथिलीक  ओ लाल ।।
मैथिलीक ओ लाल, भाल-भूषण मिथिला के ।
बाधा-विघ्नक काल, कएल जीवन्त शिला के ।।
कह लोचन कविराय, दधीचि बनल बंभोला ।
मैथिलीक बनि दास, पूज्य मैथिल हित भोला ।।

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साभार संदर्भ
देसिल बयना  (मिथिला विभूतिपर्व स्मारिका)
[पृष्ठ सं. : 21-24]
मई’ 2017
संपादक : चन्द्रमोहन कर्ण
प्रकाशक : देसिल बयना , मैथिली साहित्य मंच
118-एच.आइ, जी, मदीनागुडा, पो. मियाँपुर, हैदराबाद- 500049


[*हैदराबादक मैथिली साहित्यकेँ समर्पित संस्था देसिल बयना वर्ष भरिमे दू गोट विशेष कार्यक्रमक आयोजन करैत अछि - नवम्बर मे विद्यापति स्मृति समारोह आ मई मे मिथिला विभूति पर्वक । एहि दुनू अवसर पर स्मारिकाक प्रकाशन सेहो कयल जाइत छैक । देसिल बयना स्मारिकाक लोकप्रियता दिनानुदिन बढ़लै ये । सामग्रीक प्रचूरता वला एहि स्मारिका मे विभिन्न विधा आ विभिन्न स्तरक रचनाक समावेश रहैत छैक । एहिमे कतेको रचना उल्लेखनीय होइछ । एकर श्रेय संपादक चन्द्रमोहन कर्ण जीकेँ छन्हि जे सामग्री संयोजनसँ ल के टाइपिंग आ प्रूफ रीडिंग तकक काज असगरे गंभीर दायित्वबोधक संग करैत छथि । देसिल बयना औपचारिक रूपें स्मारिका होइतो अपन चरित्रमे मैथिलीक छौमाही साहित्यिक पत्रिका जेना अछि । 
एहि संस्थाक मई’ 2017क मिथिला विभूति पर्वक आयोजन बाबू भोलालाल दास आ धूमकेतु पर केन्द्रित छलहि ।  स्वभाविकरूपें एहि अवसर पर प्रकाशित स्मारिकामे हिनका दुनू गोटय पर केन्द्रित बहुत रास सामग्री प्रकाशित भेल अछि । ओहिमे से किछु सामग्री मैथिली मंडन पर उपलब्ध करेबाक प्रयास रहत ।] 

Saturday, June 3, 2017

मैथिलीक उन्नायक बाबू भोलालाल दास : बासुकीनाथ झा

मैथिली आंदोलनक अग्रिम पांतिमे प्रतिबद्ध योद्धा बनि डटल रहनिहार बाबू भोलालाल दास मैथिलीक सम्मान आ उत्थानक लेल अपन सर्वस्व झौंकि देने छलाह । ओ सांस्कृतिक चेतनाक स्तर पर मैथिल केँ व्यवहारिक रूपसँ पहिलबेर एकबद्ध केनिहार व्यक्तिमे सँ एक छलाह । प्राथमिक शिक्षासँ ल’ के विभिन्न विश्वविद्यालय धरि मैथिलीक स्वीकृतिक लेल कएल गेल हुनक संघर्ष अविस्मरणीय अछि । हम सब मैथिल हुनक ऋणि छी आ रहब । हुनका आ हुनक विचार आ काजकेँ (जे बहुत बेसी महत्वक छै) जाननय हमरा सब लेल आवश्यक अछि । एही भावनाक संग हुनका पर केन्द्रित किछु आलेख, आ उपलब्ध भेला पर हुनकर लिखल किछु सामग्रियो प्रस्तुत करबाक चेष्टा रहत । बासुकीनाथ झाक हुनकापर केन्द्रित प्रस्तुत परिचयात्मक आलेख हैदराबाद सँ प्रकाशित ‘देसिल बयना’ स्मारिका (मई 2017) सँ साभार लेल गेल अछि ।* 

मैथिलीक उन्नायक: बाबू भोलालाल दास
बासुकीनाथ झा
  
बासुकीनाथ झा

[पृष्ठ-19]
बाबू भोलालाल दास एक एहन अवदानी महापुरुषक रूपमे जानल जाइत छथि जनिक मिथिला, मैथिली भाषा आ साहित्यक लेल अवदानक सम्यक मूल्यांकन एखनधरि शेषे अछि । हिनक जन्म दरभंगाक कसरौर** ग्राममे सन 1894 ई. मे भेलनि आ मृत्यु 28 मइ 1977 ई. केँ ।  शिक्षा मैट्रिक प्रथम श्रेणी (1911), आइ.ए. द्वितीय श्रेणी (1913) टी.एन.जे. कॉलेज भागलपुरसँ । 1913सँ 1915 धरि मिडिल इसकुलमे शिक्षण । पुनः टी.एन.जे. कॉलेज भागलपुरसँ बी.ए. (1917) । किछु समयक लेल बेतिया इसकुलमे शिक्षण । तत्पश्चात् इलाहाबाद लॉ कॉलेजसँ 1924मे विधि स्नातक । 1925सँ लहेरियासरायमे ओकालति प्रारम्भ ।
ओकीलक रूपमे केवल अर्थोपार्जन उद्देश्य नहि राखि समाज आ राष्ट्रक अभ्युत्थानक प्रवृत्ति उजागर रहल । अपन प्रवृत्तिगत स्वातंत्र्य आ निर्भीकताक बलेँ समाजमे विशेष परिचितिक व्यक्ति शीघ्रे बनि गेला । एहि समय धरि राष्ट्रीय स्वातंत्र्य आन्दोलन आ भारतीय क्षेत्रीय भाषा- संस्कृतिक पक्षधरतापर जोर पड़ब प्रारम्भ भऽ गेल छल । आ एही समयमे भोला बाबू मिथिला- मैथिल-मैथिलीक आन्दोलनमे निस्सन डेग बढ़ा देलनि । 
सन् 1929 ई. मे एम.एल. एकेडेमी लहेरियासराय परिसरमे विद्यापति पर्वक आयोजन केलनि जे पर्व आइ मैथिल संस्कृतिक प्रतीक बनि गेल अछि । ई आयोजन ततेक लोकप्रिय भेल जे प्रतिवर्ष आयोजित होमए लागल, प्रत्येक प्रमुख गाम-शहर-नगरमे आयोजित होइत गेल । आयोजनक स्वरूप विस्तार पाबए लागल । एहिसँ समस्त मिथिलांचलमे भाषिक जनाधार स्वतः तैआर भेल आ सांस्कृतिक चेतनाक विस्तारपूर्वक जागरण भेल । लोकमानसकेँ जाग्रत करबामे एहि पर्वक भूमिका महत्त्वपूर्ण बनल । भोलालाल दासकेँ विद्यापति पर्वक प्रारम्भकर्ता, वृहत आयोजनक प्रारम्भकर्ता मानल जाइत अछि । एहू रूपमे हिनक अवदानक स्मरण करब आवश्यक ।
कोनो संघर्ष अथवा आन्दोलनक हेतु एक संस्था आवश्यक होइछ । भोला बाबू मैथिलीक क्षेत्रमे आगाँ डेग उठा देने छला । तेँ एहि हेतु सन् 1931मे मैथिली साहित्य परिषदक स्थापना केलनि । एहि संस्थाक महामंत्रीक रूपमे 1932सँ 19400 धरि अनेक महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक काज केलनि । एहि परिषदक ऐतिहासिक अनेक अधिवेशनक आयोजन एखनो प्रतिमान बनल अछि । परिषदक तृतीय अधिवेशनमे म00 उमेश मिश्रक अध्यक्षीय भाषण मैथिलीक भाषा वैज्ञानिक मान्यतामे मीलक पाथर बनल । चतुर्थ अधिवेशनक अध्यक्षता मधुबनीमे म.म. डॉ. सर गंगानाथ झा केलनि । परिषदक परिधिकेँ विस्तार दैत मुजफ्फरपुर, पटना, काशी, सहरसा, अजमेर, रोसड़ा, मन्दार मधुसूदन आदि अनेक स्थानपर अधिवेशन, विशेष उपवेशन आदिक सफल आयोजन भेल । एही क्रममे काशीक अधिवेशनमे भोलालाल दासकेँ अध्यक्ष बनाओल गेल । अर्थात् भाषा आन्दोलनक संगठनकर्ताक रूपमे भोला बाबूक अवदानकेँ स्मरण करब आवश्यक।
बिहारमे ओहि समयमे मैट्रिक परीक्षा पटना विश्वविद्यालयक अधीन संचालित होइत छल । तेँ माध्यमिक शिक्षामे मैथिलीक स्वीकृतिक हेतु संघर्ष प्रारम्भ भेल । पहिने पटना विश्विद्यालयक अभिषद (Senate)सँ पास कराएब आवश्यक छल । ताहि लेल दरभंगा महाराजक सहयोगसँ प्रयास सफल रहल । तत्पश्चात बिहार सरकारक शिक्षा विभागसँ स्वीकृति हेतु संघर्ष चलल आ अन्ततः 1940मे प्राथमिक एवं माध्यमिक शिक्षामे सरकार द्वारा मैथिलीकेँ स्वीकृति भेटल । तात्पर्य जे अन्य मनीषी लोकनिक संग भोला बाबूकेँ प्राथमिक एवं माध्यमिक शिक्षामे मैथिलीक सर्वप्रथम स्वीकृतिक सफलताक हेतु सेहो स्मरण करब आवश्यक । ई समय एहन छल जे हिन्दी-मैथिली संघर्ष सेहो संगहि चलि रहल छल । स्वतन्त्र भाषा नहि मानि मैथिलीकेँ हिन्दीक बोली सिद्ध करबाक कुचक्र चलि रहल छल । ओहि समयमे मैथिली-
[पृष्ठ-20]
-क पक्षमे आधार वस्तु सभक संकलन, ओकर समुचित भाषामे समुचित रूपेँ प्रकाशन ओ उपस्थापन लक्ष्य रहैत छल । मैथिली विरोधी लोकनिक उत्तरमे भोला बाबू स्वयं अंग्रेजी-हिन्दी-मैथिली भाषामे अकाट्य तर्कयुक्त लौह-लेखनी चलौलनि । तेँ तार्किकता, बहुभाषिकता एवं पक्षधरताक सम्यक पुरोधाक रूपमे सेहो हिनका स्मरण करब आवश्यक ।
भोला बाबू 1937मे भारतीनामक पत्रिकाक प्रकाश्न प्रारम्भ केलनि । ई मात्र एक वर्ष चलल । किन्तु एही अल्पावधिमे इ पत्रिका लोकक ध्यान आकृष्ट केलक । एहिमे मैथिलीक भाषा, साहित्य तथा सामाजिक चेतनाक वस्तु प्रकाशित कए मार्ग प्रदर्शन केलनि । पुस्तक भंडार लहेरियासरायसँ प्रकाशित मिथिलानामक पत्रिकामे एक संग दू सम्पादक भेलाह - स्वयं बाबू भोलालाल दास तथा पं0 कुशेश्वर कुमर। ई दुनू क्रमशः नवता ओ प्राचीनताक प्रतिनिधि मानल गेला - कुमरपुरातन नीति निरत छथि, ‘दासनवीन समाजी । अछि  आशा  दुनू-दुनू केँसब  विधि  रखता राजी।। एहि पत्रिकाक घोषित उद्येश्य छल - एहि पत्रक मुख्य उद्येश्य मिथिला भाषाकेँ प्रान्तीय विशवविद्यालय एवं शिक्षा विभागमे उचित स्थान प्रदान करायबे थिक, अतः पत्र यथार्थमे साहित्यिके रहत किन्तु एहिमे सामाजिको एवं धार्मिको विषयक समावेश तेहने आवश्यक बुझना गेल।
पत्रिकाक सोद्येश्यता-सार्थकताक लेल वर्तमान समयोमे ई सभ प्रतिमान बनले अछि समसामयिकताक दर्पणमे । मैथिलीक श्रीवृद्धिमे मिथिलाक योगदान ऐतिहासिक रहल। एकरा माध्यमसँ अनेक साहित्यकारक प्रादुर्भाव भेल। मैथिली सम्बन्धी चिन्तनकेँ सुनिश्चित दिशा भेटल । ई पत्रिका नवीन स्वरक उद्घोषक सिद्ध भेल । भोला बाबूकेँ एक सफल पत्रकारक रूपमे सेहो स्मरण करब आवश्यक।
प्राथमिक ओ माध्यमिक स्तरपर शिक्षण हेतु मैथिलीक स्वीकृतिक पश्चात् सामग्रीक अभावकेँ देखैत स्वयं तकर समाधान हेतु अग्रसर भेला आ तीन-तीन स्तरक व्याकरण पोथीक रचना केलनि, प्रकाशित करौलनि आ संगहि उपलब्ध करौलनि –
 1.  प्राथमिक स्तर हेतु - सरल व्याकरण 
2.  उच्च प्राथमिक स्तर हेतु - सुबोध व्याकरण तथा 
3.  माध्यमिक स्तर हेतु - मैथिली व्याकरण चन्द्रोदय
एतबे नहि, हिनक मैथिली भाषा शीर्षक निबन्ध अनेक दृष्टिसँ महत्त्वपूर्ण मानल गेल । अनेक गद्य रचना विभिन्न पत्रिकामे संस्मरण ओ आत्मकथा मिथिला मिहिरमे प्रकाशित भेल अछि । भोला बाबू कवि सेहो छला । मैथिलीक उत्कर्षक गुणानुवादतथा गंगावतरण स्तुतिविशेष प्रकारक कविता अछि । युवक शीर्षकसँ लिखल हिनक कविता तत्कालीन युवामानसकेँ उद्वेलित-प्रेरित करबामे पूर्णतः समर्थ रहल –
हमहि रोष छी प्रबल, हमहि छी तांडव भयंकर,
असन्तोष छी हमहिक्षुब्ध  मानू  छी विषधर,
हमहि अशान्तिक मूलहमहि दानव संहारक,
हमहि परम दुर्दान्तलोकमत  राष्ट्र सुधारक
हमहि  रक्त-दन्तावली-विस्फारित  केहरि  बली,
भूकथु स्वान हजार नितमहामत्त गज सम चली।
एतए रचनात्मकता एवं वैचारिकता दुनू स्पष्ट झलकैत अछि। तेँ साहित्यकारोक रूपमे भोला बाबूकेँ स्मरण करब आवश्यक।
सुनै छी जे पोथी प्रकाशन ओ पत्रिका प्रकाशनक बकिऔता चुकेबाक हेतु भोला बाबूकेँ वासभूमि बन्हकी राखए पड़लनि । आ तेँ, हुनका मैथिलीक दधीचिकहल जाए लागल ।
[पृष्ठ-30 :शेषांश]
तात्पर्य ई जे बाबू भोलालाल दासकेँ, एहि बहुआयामी व्यक्तित्वकेँ, व्यक्तित्वसँ अस्तित्व बनल महामानवकेँ, भाषा उन्नायककेँ, मैथिलीक दधीचिकेँ, भाषा संघर्ष ओ भाषा आन्दोलनक प्रतीककेँ, नवताक पक्षधरकेँ, कुशल सम्पादककेँ, सफल संगठनकर्ताकेँ, श्रेष्ठ निबन्धकारकेँ, प्रेरक कविकेँ, मिथिलाक बहुआयामी विभूतिक सुखद प्रेरक कर्तृत्वकेँ शतशः, कोटिशः स्मरण-वन्दन । तर्पण-  समर्पण । 
*******

[**एही स्मारिकाक पृष्ठ सं- 46-47 पर प्रकाशित लेख मे बाबू भोलालाल दास रचनावलीक दू खंड में संकल संपादन केनिहार फूलचन्द्र झा ‘प्रवीण’ ई फरिछाके लिखने छथि जे कसरौर हुनक पैतृक गाम छियैन मुदा हनकर जन्म अपन मातृक सहरसा जिलाक महिषी गाम मे भेल छलनि।]


साभार संदर्भ
देसिल बयना  (मिथिला विभूतिपर्व स्मारिका)
मई’ 2017
संपादक : चन्द्रमोहन कर्ण
प्रकाशक : देसिल बयना , मैथिली साहित्य मंच

118-एच.आइ, जी, मदीनागुडा, पो. मियाँपुर, हैदराबाद- 500049


[*हैदराबादक मैथिली साहित्यकेँ समर्पित संस्था देसिल बयनावर्ष भरिमे दू गोट विशेष कार्यक्रमक आयोजन करैत अछि - नवम्बर मे विद्यापति स्मृति समारोह आ मई मे मिथिला विभूति पर्वक । एहि दुनू अवसर पर स्मारिकाक प्रकाशन सेहो कयल जाइत छैक । देसिल बयना स्मारिकाक लोकप्रियता दिनानुदिन बढ़लै ये । सामग्रीक प्रचूरता वला एहि स्मारिका मे विभिन्न विधा आ विभिन्न स्तरक रचनाक समावेश रहैत छैक । एहिमे कतेको रचना उल्लेखनीय होइछ । एकर श्रेय संपादक चन्द्रमोहन कर्ण जीकेँ छन्हि जे सामग्री संयोजनसँ लके टाइपिंग आ प्रूफ रीडिंग तकक काज असगरे गंभीर दायित्वबोधक संग करैत छथि । देसिल बयना औपचारिक रूपें स्मारिका होइतो अपन चरित्रमे मैथिलीक छौमाही साहित्यिक पत्रिका जेना अछि । 
एहि संस्थाक मई’ 2017क मिथिला विभूति पर्वक आयोजन बाबू भोलालाल दास आ धूमकेतु पर केन्द्रित छलहि ।  स्वभाविकरूपें एहि अवसर पर प्रकाशित स्मारिकामे हिनका दुनू गोटय पर केन्द्रित बहुत रास सामग्री प्रकाशित भेल अछि । ओहिमे से किछु सामग्री मैथिली मंडनपर उपलब्ध करेबाक प्रयास रहत ।] 

Tuesday, May 30, 2017

‘ललित समग्र’क भूमिका : विभूति आनंद

विभूति आनंद, मैथिलीक प्रतिष्ठित साहित्यकार ललित केर साहित्य आ जीवनक मर्मज्ञ मानल जाइत छथि । ललित पर हिनकर अकादमिक शोध कार्य छन्हि आ साहित्य अकादमीसँ एकटा मोनोग्राफ सेहो प्रकाशित छन्हि । मैथिली कथा साहित्यक परंपरा मे ललितक गिनती अग्रिम पंक्तिमे ठाढ़ रचनाकारक रूपमे कएल जाइछ । विभूति आनंद द्वारा संकलित-संपादित ‘ललित समग्र’क हुनके द्वारा लिखल भूमिका एतय एहि आशाक संग प्रस्तुत कएल जा रहल अछि जे ई जिज्ञासु पाठक आ शोधार्थी लोकनिकेँ ललित आ हुनकर साहित्यक कमसँ कम परिचयात्मक बोधतँ अवश्ये कराओत ।

‘ललित समग्र’क भूमिका
विभूति आनंद



कहल जाइछ जे ललित (जन्म : 6 अप्रैल 1932, मृत्यु : 14 अप्रैल 1983) सन लेखक के जतबा लिखबाक चाहैत छलनि, ओतबा ओ नहि लिखि सकलाह । अथवा इहो कहल जाइछ जे जाबत धरि ओ आर्थिक कटमटी रहलाह,ताधरि लिखलनि । मुदा जखने इच्छित स्थिति मे आबि गेलाह, लेखन-विमुख भ' गेलाह । अथवा इहो कहल जाइछ जे लेखनक स्तर पर हुनक स्पर्धी रहथिन राजकमल चौधरी, जिनका ओ हिन्दी सँ मैथिली मे अनने रहथि, जखन हुनका संग नहि ठठि सकलाह तँ जूआ पटकि देलनि । अथवा बदलैत समयक नाड़ीकेँ पकड़बामे पिछड़ि गेलाह अथवा पछड़' लगलाह तँ गुम्मी लादि लेलनि आ अन्ततः पाटि बदलि लेलनि । अर्थात हुनक रचनाकारकेँ तंत्र स्वतंत्र नहि रह' देलकनि आ ओ तकरे अधीन भ' ' रहब स्वीकारि लेलनि ।
हुनक जीवनक समस्त गतिविधिपर जँ ध्यान देल जाय तँ तमाम शंका अपन-अपन ढंगे सही प्रतीत होइत अछि । मुदा स्वयं ललित एहि मामिला मे अलग अलग विचार व्यक्त करैत छथि । एक दिस ओ अपन लेखन- अवधि ओ स्थिति सँ संतुष्ट बुझि पड़ैत छथि तँ दोसर दिस एहिपर तामस करैत देखल जाइत छथि । हुनके शब्द मे-'हम कम नइ लीखल । मगर आब एकटा वितृष्णा सँ मोन भरि गेल । हम अपना केँ मैथिलीक शोभा-यात्रामे आगाँ-आगाँ चलयवला हओदा कसल मकुना-पट्ठा कहियो ने बूझल, मुदा डाक्टर-परफेसर आदिक चोंगा ओढ़ि Trash लिखयवला सँ हीनो नइ बूझल । अद्यावधि हमरा कोनो स्थान नहि देल मैथिलीक दलबन्दी ।...तखन लिखबाक उद्देश्य हमर विफल...'फिर बेताल उसी दरख्त पर जा लटका ।' फेर अपन साहित्य घोंघा-बसन्ती अभिव्यक्तिक 'उम्रकैद मे दफ्न ।' ककर दनक बकरी, त ककर दनक पाठी आ फल्लाँ दाइक चिट्ठी, ' पथ हेरथि राधा! Pure and outright nonsense! किए लिखू? पायिक प्रयोजन नइ । जीविकाक साधन नइ । तखन Proper placement, ' ताहू सँ outcast! की एहेन दमघोंटू, बंध्या स्थितिमे अहाँ लिखनाइ जारी राखि सकैत छी ?'
अर्थात अपन एहि छोट सन तामस मे ललित लगैछ जेना मैथिलीक तमाम दूषित गतिविधिकेँ सरेआमक'' राखि देलनि अछि । मुदा एखन एहि तामसपर विमर्श कर' सँ अधिक उचित बुझैत छी जे हुनक अवदानक गप करी । हुनक लेखन अवधि अछि-13-14 वर्ष, अर्थात् 1950 सँ 1964 धरि । ओना एकर बादो किछु कथा उपलब्ध होइत अछि । लगैछ ओ सब ओही अवधिक रफ रहल होनि, जकरा फेयर क'' फरमाइसपर छपबा लेल देने होथि । अस्तु । एहि अवधि मे ओ लगभग 40 कथा-लघुकथा(जे हमरा उपलब्ध भ' सकल, प्रतिनिधि संग्रह सहित ), एकटा उपन्यास (पृथ्वीपुत्र) आ टिप्पणीत्यादि लिखलनि । एकर अतिरिक्त दू टा संस्मरण आ एकांकी सेहो उपलब्ध होइत अछि । वैदेही मे धर्मधकेलानन्दक नाम सँ 'गोनू झाक चौपाड़ि' स्तम्भक किछु अंशक लेखन सेहो कयलनि । दरभंगा प्रवास धरि 'वैदेही'क संपादन सँ सेहो जुड़ल रहलाह । ओही कालखंडमे मैथिली गद्यक प्रांजलता ओ वैचारिकता अछिंजली लोटा जकाँ चमकल छल । ओही कालखंडक उपलब्धि भेलाह-ललित, राजकमल चौधरी, मायानन्द मिश्र, उग्रानंद, बलराम, हंसराज, जयानंद...आदि, जनिका सभक कारणे आधुनिक मैथिली गद्य अपन एक अभिनव रूप मे प्रतिष्ठित अछि ।
अर्थात सम्पूर्णतामे देखल जाय तँ ललित वास्तवमे आधुनिक मैथिली गद्यकेँ संस्कारित कयनिहार शिखर पुरुष भेलाह । ओ ढाकीक ढाकी नहि लिखलनि । जे लिखलनि, सुविचारित लिखलनि, जे कयलनि मैथिली गद्य साहित्यकेँ विश्व साहित्यक समकक्ष अनबा लेल कयलनि । अर्थात अपन भाषा-साहित्य लेल जे सपना विश्व साहित्य पढ़ैत काल देखलनि, तकरा रूप देलनि । हुनक कथा हो, आकि उपन्यास, आकि आने लेखन, कतहु रिपिटेशन नहि अछि । सब ठाम एक नव जभीनक दर्शन होइत अछि । तेँ कहि सकैत छी जे ओ तँ एक माला तैयार कयलनि, जे आइयो ओहिना टटका अछि, मौलायब नहि सोचलक एखनो धरि । आ ताहि दृष्टि सँ मैथिली भाषा-साहित्यक प्रति कयल गेल ललितक काजकेँ कमक' ' नहि आँकल जा सकैछ ।
तखन ललितकेँ जेना पढ़ल जयबाक चाही, तेना नहि पढ़ल गेल । आ तकरो कारण अछि-हुनक प्रकाशित लेखनक अनुपलब्धता । ओ अपना लग किछु नहि रखलनि । तेहेन कोनो पुस्ताकालय नहि, जतय ओ उपलब्ध होइतथि । अस्तु ।
कोनो संकलन जँ प्रकाशित होइछ तँ ओकर एक नाम राखल जाइछ । हम तेँ एहि संकलनक नाम राखल- 'ललित समग्र' । मुदा सही अर्थ मे ई 'समग्र' नहि थीक । हमरा ललितक रचना मादे जतबा जे बूझल छल, तकरो उपलब्ध कर' मे सक्षम नहि भ' सकलहुँ । 'वैदेही' हो आकि 'पल्लव' आकि 'मिथिला दर्शन' आकि दरभंगावला 'मिथिला मिहिर'- ककरो सम्पूर्ण फाइल नहि उपलब्ध भ' सकल, जाहि सँ आर-आर सामग्री उपर होइतय, अथवा बहुतो झोल-झाल साफ होइतय । तखन एतबा जरूर जे ललित जाहि उपन्यास (कर्मण्येवाधिकारस्ते...)क तथा प्रेमकथा सभक लिखल होयबाक बात कहने छथि, से सबटा हुनक इच्छा मात्र छलनि, लिखल किछु टा नहि । जे लिखल छनि आ जकर सूचना छल तथा हमरा उपलब्ध नहि भ' सकल ओ सभ कथा अछि- 'स्पर्धा', 'समाजक सहयोग', 'बोलबम','कुलटा','प्रतिशोध' 'दीक्षा'  ।
हम एतय ललित-साहित्यपर विमर्श करवा सँ परहेज करैत छी । हमरा जे किछु हुनका मादे कहबाक छल से 'श्री ललित आ हुनक कथा यात्रा' नामक पोथी (डिसर्टेशनक पुस्तकक रूप )मे एक विद्यार्थीक बुद्धि सँ कहि चुकल छी । पश्चात एक लेखक रूपमे, ओकरे आधार मानि 'ललित' नामक मोनोग्राफ (साहित्य अकादमी द्वारा प्रकाशित)मे फड़िछौने छी । तेँ ललितकेँ जनबाक लेल 'ललित समग्र'क संग-संग 'ललित' नामक मोनोग्राफकेँ पढ़बाक हम विनम्र आग्रह सेहो करैत छी ।
तखन एतबा एत' जरूर कह' चाहब जे ललित जीवन ओ जगतक लेखक छथि । हुनक लेखन प्रगतिशील सोच पर विश्वास करैत अछि, जत' ओ एक दिस परम्परागत रूढ़िक घोर विरोध करैत छथि, ओतहि एक नब बाट दिस चलबाक संकेत सेहो दैत छथि । जाहि-जाहि स्थिति-परिस्थितिकेँ आन-आन लेखकगण अबडेरैत रहलाह, ग्राम्य बूझि ताहि सँ कतिआइत रहलाह, ओहन सभटा अछूतकेँ ललित प्रतिष्ठा देलनि, सरज-सरल ठेठ ग्रामीणक ठोंठमे स्वर देलनि तथा ताहि सभक प्रतियें अपन सहमति सेहो व्यक्त कयलनि । ओ समयक महत्व केँ बुझलनि, ओकर हुंकारकेँ अकानलनि, आ तेँ भविष्यक प्रति अपन लेखनीमे साकांक्ष भेलाह ।
ताहि समय-शक्तिक पुजारी, परम्परित व्यवस्थाक विरोधी तथा नवीन पीढ़ीक आबेसी रचनाकार ललितक समग्र लेखन केँ एकठाम देखबाक इच्छा समस्त मैथिली पाठककेँ रहलनि । ई संकलन ताही अभावक पूर्ति दिस एक प्रयास थिक ।
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साभार स्रोत* 
संकलन संपादन - विभूति आनंद : ललित समग्र : प्रथम संस्करण -2012 : मैथिली अकादमी. 740/800 लालबहादुर शास्त्री नगर, पटना-23


[*स्पष्टिकरण : मैथिली मंडनपर एहि तरहक कोनो सामग्री मैथिली पाठक आ शोधार्थी धरि प्रयोजनीय सामग्री केँ पहुँचेवाक उद्देश्य सँ प्रस्तुत कयल जाइत अछि । एकर पाछू किनको व्यवसायिक अहित करवाक भावना नहि होइत अछि । संभव भेला पर सम्बंधित पक्ष सँ अनुमति लेवाक अथवा सम्बंधित पक्ष केँ सूचना देवाक चेष्टा कयल जाइत छैक । कैक बेर एकर जरूरति नहि बुझेला पर अथवा सम्पर्क सम्भव नहि भेलाक बावज़ूदो संदर्भ स्रोत केर साभार उल्लेख कयल जाइत छैक । मैथिली-मंडनक अपन सम्पूर्ण प्रस्तुति केँ दुर्भावनारहित राखवा लेल कृतसंकल्प अछि । तथापि सम्बद्ध पक्ष केँ जँ कोनो तरहक आपत्ति होइन तब्लॉग पोस्ट पर अपन प्रतिक्रिया मे अथवा जी-मेल पता maithilimandan@gmail.com पर अपन आपत्ति दर्ज करा सकैत छथि । यथाशीघ्र हुनक  आपत्तिक निपटारा मैथिली मंडनकप्राथमिकता होयत ।]

Monday, May 29, 2017

एखन सहरसा सँ : महेन्द्र

महेन्द्र जीक रचना- एखन सहरसा सँकेँ बहुत महत्वक संस्मरणात्मक आलेखक श्रेणी मे राखल जा सकैत अछि । ओ सहरसा मे बैसि के सुपौलके मोन पाड़ि रहल छथि ,आ एहि बहाने एकर भूगोल, इतिहास, दशा आ संस्कृतिक उल्लेखे टा नहि समीक्षो करहल छथि । ऐतिहासिक रूपसँ महत्वक हकदार होइतो सुपौल उपेक्षित आ अल्पज्ञात जिला रहल अछि । एहि जिलाक सांस्कृतिक विशेषता, विवशता, अभाव आ इतिहासक कतेको पहलू सँ अवगत होइबामे ई आलेख नीक मदद कसकैत अछि । एहि आलेखमे महेन्द्र जीक नेनपनसँ लके एखन धरिक अवलोकन आ विश्लेषण आयल छै । एहि आलेख मे सुपौल जिला मुख्यालये टा नहि एहि जिलाक किछु सुदूर गाम-ठाम आ मुख्यतः जिला मुख्यालयक दक्षिण बसल गाम सबहक नीक परिचयात्मक उल्लेख भेल छै । एहि मे आर कतेको एकदम नवीन जानकारी भेट सकैये जेना,  सुपौल क विलियम्स हाइस्कूल : सहरसा, मधेपुरा आ सुपौल तीनू जिलाक पहिल हाइस्कूल छलहि । वा, सुपौल मुख्यालयसँ किछुए दूर दक्षिण स्थित कर्णपुर गाम मे अंग्रेज राजक दौरान नून बनाके सत्याग्रही लोकनि कानून तोड़ने छलाह आ अपन देह पर लाठी झेलने छलाह । वा, ई जे सहरसा फारविसगंज रेलखंड पर सहरसा-सुपौलक मध्य अवस्थित गढ़ बरूआरी स्टेशनक नाम कहियो परसरमा स्टेशन छलहि ।
एहि आलेखकेँ पढ़ैत बुझाइत अछि, महेन्द्र जीकेँ सुपौल जिलाक अंतःलोक पर बहुत गहींर पकड़ छन्हि । भारती मंडनक अंक-13 (नव क्रमांक-1) मे प्रकाशित भेल एहि आलेखक सहज भाषा आ रोचक शैलीतँ बहुत बेसी प्रभावशाली छहिये ।

एखन सहरसा सँ
महेन्द्र 
[पृष्ठ-127]
चारिम-पाँचम दशकमे भागलपुर जिलासँ फराक भेल एकटा स्वतंत्र जिला बनल-सहरसा । पहिने भागलपुरक ई उप-जिला, जकर थाना बनगाम रहै । बहुत पछाति सहरसाकें थाना आ सब-डिवीजन भेटलैक । माया बाबू कहैत रहथिन- सहरसाक जन्म उनटे भेलै-ए । एहि जिला कें पुरनका दू टा सब-डिवीजन छलै- सुपौल आ मधेपुरा । सहरसा एही दुनू सब-डिवीजन पर निर्भर छल । ने अपन थाना आ ने अपन सब-डिवीजन...।
सहरसा कें तहिया अंगरेजक बनाओल हाईलेट स्कूल छलै । यैह स्कूल कालान्तर मे मनोहर हाई स्कूल नामे परिचालित भेलै । बिहार सरकार पछाति एहि संस्थाकें राजकीय नहि राजकीयकृतक दर्जा देलकै । आब तँ एतय जिला गर्ल्स आ व्वायज स्कूल छै ।...मुदा एहिसँ बहुत पूर्वहि सुपौलमे विलियम्स स्कूल भरिसक 1889 ई॰ मे आएही लग-पास मे जेनरल हाई स्कूल मधेपुरामे खुजलै । ई दुनू एहि परोपट्टाक शिक्षा ओ विशिष्टताक दुआरें चर्चामे सबसँ ऊपर रहलै । कालान्तर मे ई दुनू संस्था अपन कार्य-संस्कृतिक कारणे नेतरहाटक शिक्षा, अनुशासन आ रीजल्ट मे समकक्ष भगेल ।
उच्च शिक्षामे सुपौल कने पछुआयल । ओहि सँ पूर्व 1952 ई॰ मे सहरसा कॉलेज, सहरसा आ 1953 ई॰ मे टी॰ पी॰ कॉलेज, मधेपुराक स्थापना भगेल छलै । ई दुनू कॉलेज भागलपुर विश्वविद्यालयक प्रीमियर कॉलेज छल ।
सुपौलक भारत सेवक समाज कॉलेज 1959 ई॰क आस-पास बनलै । मुदा एतुक्का सभसँ खास विशेषता रहलै एकर निजत्व । सामाजिक स्नेहसँ सिक्त परिवारिक सम्बन्ध ।
[पृष्ठ-128]
डीहवारक धरती हेबाक सभटा गुण सुपौलकें एखनहुँ उपलब्ध छैक । बाहरोसँ जे परिवार एतय आबि बसल, सभ भाइ-भैयारीक सरोकारमे रमैत सुपौलक खासम-खास भगेल मनसँ, तनसँ आ धनसँ...।
31, जनवरी 2009 ई॰ मे हम पी॰ जी॰ सेन्टर, सहरसासँ रिटायर भेलहुँ । एतधरि एबामे सुपौलक योगदान हमरा लेल अविस्मरणीय अछि । जन्म स्थान हेबाक गौरव आ व्यक्तित्वक निर्माणमे सुपौलक भूमिका जे हो, मुदा हमरा एखनहुँ ओतदुलार-मलार मे कोनो घट्टी अनुभव नहि होइत अछि । साँचे, जखन हम ओतजाइ छी तँ हमर वार्द्धक्य बिलाकनेनाक रूप ग्रहण कलैत अछि...।
सुपौल, नेपालक सीमासँ सटल अपन निजत्वक रक्षा करैत रहल अछि । बाढ़ि सँ बिलटल होइतो ई अपन सामाजिक, सांस्कृतिक ओ आर्थिक संस्कारकें जोगबैत रहल अछि । कहल जाइत अछि जे 1934 ई॰ सँ पहिने जखन रेलगाड़ीक परिचालन रहै- पूर्वांचल आ पश्चिमांचलक संबोधनो नहि छलै । मैथिलक संबंध-सरोकार, कुटुम आ कुटमैती, आबर-जातक उदाहरण लोक आन क्षेत्रकें दैत काल अपन विशाल क्षेत्र पर गर्वक अनुभव करैत छल । मुदा 1934-35क बाढ़ि आ भूकम्पक पछाति ई मधुर सरोकार...सब खतम...। दरभंगा जिलाक नजरिमे हम पूबा-डूबा भ गेलहुँ । मण्डी व्यवस्थापनमे जे सुपौल आगाँ छल, असुविधासँ भरल यातायातक दुआरें पिछड़लागल । एकहि सब-डिवीजनक निर्मली आ सुपौल धारक दुनू कात संवादहीनताक दंशसँ दुर्बल भगेल । तथापि दुनू स्थान व्यावसायिक ओ सामाजिक संस्कारमे भीजल असुविधहु मे जनचेतनाक हितचिंतक रहल । समयक चाँछ सँ आहत सुपौल आ निर्मली कहियो इस्सनहि कयलक ।
मरखाहि कोशीकें भोगैत शान्त-शीतल आ स्थिर स्थितप्रज्ञ सन सुपौल, चारूकात बसल भिन्न-भिन्न गामक बीचमे अपन सहिष्णु छवि बनौने हँसैत-मलरैत अपन विकासगाथा, अपनहि संस्कारक परिधिमे रहि कहैत रहल, बँटैत रहल । गाम-घर मे दुलारसँ लोक सुपौल कें सिपौले कहि संबोधित करैत अछि एखनो...।
सुपौलक चारूकातक गाम, गामे टा नहि आचरणे सरोकारी संस्कृतिक प्रतीक अछि । तें सुपौल बिना गाम आ गामक बिना सिपौल बुढ़ियाक फूसि...कनियो टा फराक नहि...एक दोसराक पूरक...। ओहिना जेना अस्पताल चौक । सभ दिस जाइत सड़क आ ओम्हरहु सँ अबैत सड़क एतहि आबि आत्ममिलन आ आत्ममंथन करैत अछि । समयक  संग ठाढ़ भेल एतुक्का सिरीशक गाछ अपन घेंच नमरा कसभ गामकें समाचार दैत अछि आ गामक सभ गतिविधिक सुधि-बुधि लैत एक दोसराक दुख-सुखक साक्षी बनैत अछि ।
अजुका तारीखमे जँ सहरसा सँ सुपौलक यात्रा करबाक हो तँ अहाँ दू टा बाटक उपयोग कसकैत छी । पहिल तँ रेलगाड़ी, जे एखनहुँ 29 कि॰ मी॰ डेढ़-दू घंटामे सुपौल पहुँचबैछ । उत्तर बिहारक ई क्षेत्र जे पूबा-डूबा नामे संबोध्य अछि, तकर अधिकांश क्षेत्र रेलक विकासक नाम पर रेलमंत्री लोकनिक आश्वासन पर संतोष करैत आयल अछि । भूकम्प आ बाढ़िसँ ध्वस्त स्वाधीनता पूर्व बनाओल मीटरगेजएखनहुँ ओही अवस्थामे उपयोग कैल –
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- जाइत अछि । यैह बाढ़ि आ भूकम्प सुपौल आ निर्मलीकें फराक कदेलक । फारबिसगंजो सुपौलसँ भीन भगेल । ओ तआभारी रहबनि ललित बाबूक जे अपना कार्यकालमे सुपौल आ फारबिसगंजकें जोड़लनि । मुदा कपार मे जे लिखा कआयल अछि तकरा के मेटा सकैत अछि । 2008 ई॰क बाढ़ि फेर एहि खण्डकें चाटि गेल । जन-धनक नोकसानक संग-संग सौंसे कोशी आ पूर्णियाक रेल-रोड सम्पर्क खण्ड-खण्ड भगेल । देश एहि क्षेत्रक दुर्दशा पर द्रवित भराष्ट्रीय आपदा घोषित कदेलक । विश्वक अधिकांश देश आ देशक अधिकांश राज्य आगाँ बढ़िकएहि क्षेत्रक मुँह पोछलक । आब सुनै छी जे आठ बर्खक बाद कहाँदन सहरसा सँ पूर्णिया एकबेर फेर बड़ी रेल लाइन सँ जुटत । रोड तँ किछु दिन पूर्व जुटि गेल छल । मुदा सुपौल...ओहिना...।
...ओना सुपौल जेबाक लेल सुविधाजनक सड़के छैक । रेलसँ ओतपहुँचबामे जतेक समय लगैछ ताहिसँ बेसी प्रतीक्षामे काटपड़ैत छै । ओतबा कालमे सुपौल गेल जा सकैछ...अन्तर भाड़ाक छै...रेलसँ 10 टाका आ रोडसँ 40 टाका । मुदा बस आनत धरि  सुविधा सँ...ने हर-हर, ने खट-खट...। स्टैण्ड पर स्टार बस डिक लागल रहै छै । अहाँक मोन पर अछि...सड़क आब खूब विश्वसनीय भगेल छैक । सुपौल, सहरसा, मधेपुरा बिहारक प्रायः सभ पैघ शहरसँ जुटि गेल अछि । सुपौल कें एकटा लाभ भेटलैक एन॰ एच॰ 57क जे आसामक सिलचर, गुजरातक पोरबन्दरसँ जुटि गेल । ई एहि क्षेत्रक लाइफ लाइनबनि गेल छैक । एतबे नहि कोशी महासेतु तँ दरभंगा आ सुपौलकें मुट्ठीमे अँटा नेने अछि । भपटियाहीसँ दस कि॰ मी॰ पश्चिम ई महासेतु कोशी पर बनाओल अत्यंत दर्शनीय ओ आकर्षक सेतु अछि...।
मुदा दुखद कथा ई अछि जे साहित्यकार मायानन्द मिश्रक गाम बनैनियाँ कोशीमे विलीन भगेल । एही गाम बाटे जाइत रेलक रहड़िया स्टेशनक सिरखार आब बहुत गिद्ध दृष्टि देला पर कतहु झलकि सकैत अछि । नजरि जँ निर्बल हैत तँ नहियो देखि सकै छी । सूचना इहो अछि जे ओतुक्का हाई स्कूल भपटियाहीमे चलाओल जाइछ । बर्ख भरि पर फेरल जाइत अपना गामक बीटसँ काटल हनुमानी धूजाक बेगरता आब बनैनियाँकें नहि पड़ैछ । नारदी, पराती, नचारी-महेशवाणी आदि पारंपरिक गीत कोशी छीनि लेलक । आब तँ धीरे-धीरे बनैनियाँक सभ अच्छर बिला रहल अछि...अख्यासहुसँ उतरि रहल अछि...। मुदा सर्वेक पुरनका नक्शा मे बनैनियाँ एखनो जीबैत अछि ।
माया बाबू सदिखन चर्च करैत रहथि जे बनैनियाँमे तीन टा नन्दयोगानन्द, गुणानन्द आ मायानन्द । योगानन्द अपन कोनो कारणे नाम बदलि सीतारामरखलनि आ इन्कम टैक्स विभागक सर्वोच्च पद सँ रिटायर भेलाह । गुणानन्द, सुपौल लोकसभाक प्रतिनिधित्व कयलनि आ हमगामसँ मातृक, फेर दरभंगा, तखन पटना आ निर्णायक रूपमे सहरसा कॉलेजक मैथिली विभागमे व्याख्याता भेलहुँ आ सहरसे सुपौलक भरहि गेलहुँ । अर्थात दुनू नन्दक अपेक्षा हम. ..जकर सीमा सहरसे धरि सीमित रहल...एकदम कमजोर कड़ी...।
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तखन हमरा हँसी लगैत छल । मुदा हम ई जनैत चुप भजाइत छलहुँ जे अपना सँ बेसी अपन अग्रज मित्रकें महिमामंडित करब हुनक आदति छलनि । निर्विकार-निश्छल अभिव्यक्ति । अपना सँ छोटक रचना पढ़लाक उपरान्त सभकें कहथि- तोहर रचना पढ़लिय’...ईर्ष्या भेल...हम एतेक नीक नै लीखि सकै छी । ...ई तहुनक व्यक्तित्वक महानता छलनि...तें मायाबाबूकें बनैनियाँ  मे नहि हुनक रचनामे ताकू...चैपालमे अभिव्यक्त घूटर भाइक स्वरसँ चीन्हू आ चीन्हू हुनक क्लासरूमक व्याख्यान आ मंचक मधुर उद्घोषणासँ...बनैनियाँ तँ आइ नव-नव गामक रूपमे विकास करहल अछि से विद्या आ वैभव, दूनू दृष्टियें ।
परसरमासँ दक्षिण बहैत खरिदाहा पुलक उतरबरिया पायासँ सुपौल जिला शुरु होइत  अछि । ओतसँ हरियरी देखार होमलगैछ । सड़कक दुनू कात आम-लुच्चीक बगान, बाँसक बीट आ बहुत रास गाछ सभ आँखिकें संतोष दैत छैक ।
परसरमाचर्चित गाम अछि । यैह गाम बाबा लक्ष्मीनाथ गोसाईंक जन्मस्थली थिकनि । ओतय हुनक नेनपन आ किशोरावस्थाक चांचल्य छनि । गोचारण आ पठन-पाठनक संग संगी सभक बीच हँसी-चैल छनि...मुदा बाबाजीक परसरमा खाली जन्मस्थलीए टा रहलनि...बाकी भक्त आ आश्रमक संख्या आने ठाम बेसी रहलनि...एहि मे बनगाम सभसँ ऊपर अछि...।
एखन परसरमामे गोसाईं जीक पुस्तैनी भू-खण्ड पर बनाओल हुनक मंडप आ बैसिकीक लेल दलान अछि जाहिमे पुजेगरीक संग किछु भजनी भजन गाबि हुनक स्मरण करैत छनि ।
हिनक रचित भजन सधुक्करी मैथिली भाखामे रचित जीवन ओ जगतक मानवीय संवेदनाक प्रति भक्ति ओ आध्यात्मिक संदेश अछि जे मनुष्यकें अपनासँ साक्षात्कार करबैत   अछि । मैथिली संत साहित्यक अन्तर्गत हिनक अवदान विस्तारसँ रेखांकित भेल अछि । हिनक भजनावली मिथिला ओ आनहु ठाम अत्यन्त आदरक संग राखल ओ पढ़ल जाइत अछि । गोसाईंजी जीवनक कथा आ मनुष्यकें जीबाक कलाक ज्ञान करबैत अहंकारसँ दूर रहि लोक सेवाक पाठ पढ़ौने छथि । ओ नरकें भक्तिक मार्ग पर चलैत अपन रचनाकें सार्वजनीन कयने छथि जे मानव-सदुपयोगक संदेशसँ भरल अछि...। मिथिलाक लोक संगीतक भास पर आधारित हिनक भजन खूब गाओल जाइछ ।
...सहरसासँ सुपौल धरि जाहि रेलक उपयोग अदौसँ करैत आयल अछि तकर तेसर स्टेशनक नाम परसरमाथिकै । एहि ठामसँ ई गाम चारि वा पाँच कि॰ मी॰ पश्चिम स्थित छैक । भसकैत अछि अंग्रेजी सरकार आध्यात्मिक साधक लक्ष्मीनाथक नाम पर ई नाम रखने हो । ओना ई हमर व्यक्तिगत विचार थिक जकरा नहियो मानल जा सकैत अछि ।
परसरमाकें रेलसँ बेसी सड़केक सुविधा छैक। स्टेशन जेबाक लेल परसौनी, बरैल आ तखन बरुआरी अबैत छैक जतगाड़ीक ठहराव छैक । बरुआरियो दू टा आ बीचमे धार...स्टेशन लग यैह सभ गाम छैक । ...तखन परसरमाक नाम किएक...? मोन मे बहुत रास प्रश्न उठल...प्रश्नो स्वाभाविके रहय...। बरुआरीमे तत्कालीन जमींदार लाल साहेबक घर...
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- अपने खूब प्रतिभाशाली ओ प्रभावशाली अंगरेजी सरकारक पसिन्नक राजा आ क्षमतामे अशेष व्यक्तित्व...।
हम जखन एहि स्टेशनकें क्रॉस करैत रही तँ बेर-बेर ई प्रश्न हमर उत्तर ताकबाक लेल प्रेरित करैत रहय । घूमि-फिरि कलाल साहेब सोझाँमे चमकि जाथि...हिनक अछैत परसरमानाम अंकित भजायब...ई रहस्य के खोलत...? एकरा तँ छीनब कहल जा सकैत अछि । गामक लोक परसरमानामक टिकट जखन कटबैत हैत तँ ओकर केहन मनोभाव हेतैक से सद्यः अनुमानित छल...मानसिक आ मनोवैज्ञानिक रूपें ओ लोकनि निश्चित प्रताड़ित अनुभव करैत रहल हैत से सोचब कठिन नहि छैक । की बितैत हेतै ग्राम्य देवता आ गौंआकें...अपराध बोधकें मोन मरमोसि कोना एक ग्लास पानि पीबि शांत भजाइत हैत...आदि-आदि प्रश्न हमरा एखनो अख्यासमे अबैत अछि...।
अख्यासल तँ ईहो अछि जे बाढ़ि, परसरमाकें सुपौलक सम्पर्कमे कहियो चैन सँ रहनहि देलकै । 51-52 ई॰ मे वैद्यनाथधाम जेबाक लेल ट्रेन परसरमे मे पकड़ने रही । फेर बख्तियारपुरसँ नाहे-नाह धमारा आ तकर बाद आगाँ बढ़ी...
दुर्दशा छलै...। मुदा 52-53 ई॰ मे ई रेलपथ आपसमे जुड़ैल । एही पथसँ देशक प्रथम राष्ट्रपति राजेन्द्र बाबू स्पेशल ट्रेनसँ श्रमदानसँ बनल विश्वक प्रथम कोशी बान्हक उद्घाटनक लेल आयल रहथि सुपौल-बैरिया...। ओहू समयमे ट्रेन सुपौले धरि । ...हमरा इहो मोन पड़ैत अछि जे भरिसक 58-59 ई॰ मे तत्कालीन रेलमंत्री, राम सुभग सिंह सुपौल सँ आगाँक रेल विस्तारक लेल मालगोदाम परिसर मे आयोजित सभामे कोनो शिलान्यास कयने रहथि...ओकर बाद की भेलैक से मोन नहि पड़ैत अछि...।
मुदा गढ़-बरुआरी के निसाफक प्रतीक्षा छलै । कवि रघुनाथ मुखिया कहलनि जे ओ 1962 ई॰ धरिक टिकट पर परसरमास्टेशन छपल देखने अछि । बरैलक डॉ॰ धीरेन्द्र कहलनि जे ओ 1963 ई॰क आरंभहिमे आयोजनपूर्वक परसरमाक स्थान पर गढ़-बरुआरीक नामपट्ट लगबाक साक्षी छथि ।
एहि परिवर्त्तनक नेपथ्यकथा बहुत संवेदनशील अछि । हम जे अपना सर्वेक आधार पर बुझलियै तकर निष्पत्ति छलै वर्चस्वक लड़ाइ आ यैह वर्चस्व दुनू गामकें तनावग्रस्त कयने रहय । भीतरक कथा जे रहल हो मुदा स्टेशनक नाम परिवर्त्तनक झगड़ा मोछ-मोछक झगड़ा कहल जा सकैत अछि । एहि तथ्यकें बरैलक तेरासी वर्षीय कवि अमरसेहो गछलनि...लाल साहेब मोकदमा कयलनि...भूप बाबू ओकील रहथि ।  गढ़-बरुआरीकें निसाफ भेटलै- से लालसाहेबक मुइलाक बाद । बरुआरी जे गढ़ी छल से गढ़गेल...हमरा जनैत ओहि कालखण्डमे कोनो रेलवे स्टेशनक नाम परिवर्त्तनक प्रायः ई पहिल घटना रहल हेतैक...।
मुदा परिवर्त्तनक एहि दृश्यकें लाल साहेब नहि देखि सकलाह । बरुआरीक संग हुनका जे निसाफ भेटलनि से हुनक आत्माकें निश्चिते जुड़ौने हेतनि । 25 दिसम्बर 1961 ई॰ कें हुनक निधन सभकें अप्रत्याशित घटना लगलैक । निधन आ निधन सँ सम्बन्धित कतेको कथा-उपकथा सुपौल स्टेशनसँ पूब बनाओल लाल साहेबक लाल कोठीसँ उड़लै जे  -
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- निर्णये नहि कपौलक जे असल मे बात की भेलै । समाचार तँ समाचार थिकै प्रत्यक्ष वा अप्रत्यक्ष पसरबे करतै...। मुदा सत्य वैह जे लाल साहेबक निधन भगेलनि आ हुनक स्मृति मात्रहि आब शेष रहत...।
गोर वर्ण, आकर्षक भरल-पूरल देह-यष्टि, कारी सूट आ कारीए हैट...आमक फाड़ा सन पैघ-पैघ एक जोड़ी आँखि पर ब्लैक गॉगुल्स...। डेरासँ एही ड्रेसमे बहराइत रहथि राजा साहेब । आगू-आगू दस मीटर पर मस्त चालिमे चलैत कारी भौर विदेशी नस्लक भयभीत करवला, मुँहमे साहेबक गोल्डेन मूठबला छड़ी लेने पोसा कुकूर आ सड़कक दुनू कात एहि मनोरम दृश्यकें देखलेल ठाढ़ आवाल-वृद्ध-वनिता 25 दिसम्बर 61क बाद कहियो नहि देखि सकल...।
ई दृश्य हमरा वृत्त-चित्र जकाँ ओहिना सोझाँमे पसरि जाइत अछि । तहिया चकला निर्मलीसँ सतमा पास कविलियम्स स्कूलमे नाम लिखौने रही । ओही बर्ख बच्चा भैयाकें पशुपालन विभागमे नोकरी भेटल रहनि । वीरपुरसँ ओ अपन काज आरंभ कयने रहथि । दरमाहा छलनि पचास टका पचास पैसा । देहातक भिजिटमे किछु आर उपार्जन कलैत रहथि । तकरे जोड़ि-जोड़ि एकटा सेकेण्ड हैण्ड साइकिल कीनने रहथि गाम अबरजात करबा लेल । ओ सभ शनिकें आबथि आ सोमकें भोरहरियेमे विदा भजाथि । भेलाहीमे जे दुइ तीन टा साइकिलक चर्चा छलै ताहिमे इहो एडगेलै ।
एहिसँ पूर्व हम परसरमाक नरेसर बाबू, कर्णपुरक मुक्तिनाथ बाबू आ वकील ज्ञानदत्त मिश्रकें नित्तह साइकिल हाँकैत देखने रहियनि । तहिया एकटा आरो साइकिल देखलियै- हुसुन बाबूक...। लोक बजैत रहै जे हुसुन बाबूक वाइ-साइकिलसनरेले थिकै मेड इन इण्डिया । जहिना अपने छिपगर तहिना साइकिल खड़गर-नमगर...अपना कद काठीक हिसाबसँ ओ कसबौने   रहथि ।
से बच्चा भैयाक साइकिल देखि आ छूबि पहिल बेर अपार आनन्द भेल रहय । भोर-साँझ पोछब, तेल देब हमरे ड्यूटी छल । भैया सोमकें जखन वीरपुर जेबाक लेल चलथि तँ हम झुनकू ठाकुरक घर धरि दौड़ल जाइते रही आ जखन भैया आ साइकिल मवेशी अस्पताल लग अढ़ भजाइ तहमहूँ निरुत्साहित घूमि आबी ।
ओना हम चोरा-नुका कसाइकिल सीखियो नेने रही।
हमर पिताजीक निधन 17 दिसम्बर 61 कें भगेलनि सुपौल अस्पतालमे इलाजक क्रममे । ई निधन हमरा लेल बहुत पीड़ादायक छल । घूर तपैत काल बच्चा भैया हुनक मृत्युक सूचना देने रहथि । तकर बाद जे होइ छै ओ मोन पाड़ि एखनो डेरा जाइ छी । कहाँदन बुच्चू बाबा आ नेपाल मरड़ जिज्ञासामे सान्त्वना देने रहथि । गामक लोक सभ एहि दुखमे सहभागी भेल रहथि ।
कक्काकें फरकी पर अस्पतालहि सँ आनल गेलनि आ बम्मा लग हुनक संस्कार भेल रहनि । कक्काकें तखन आगिसँ एकोरत्ती डेराइत नहि देखने छलियनि । पेटक पीड़ाक छटपटाहटि ओहो अनुभव नहि कयलनि...हमरा लागल छल डॉ. रामक दबाइ असरि करहल छनि आब ।
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समय बीतलगलैक...।
चारिम दिन बच्चा भैया, एकटा अपरिचितक संग पाँच-सात गोटा मिलि गाछी गेलहुँ । अपरिचितक मादे पुछला पर कहल गेल जे ओ पूज्य (पात्र) रहथि । कक्काक सारा मे एखनो आगि शेष रहय, मुदा कक्का नहि छलाह । पूज्यक कथनानुसार पूजा-पाठ भेलै आ तकर बाद बच्चा भैया किछु-किछु बीछि नवका मटकुरीमे रखलनि आ कोनो साफ कपड़ा सँ मुँहकें बान्हि घुरि अयलहुँ । घूरन भैया एहि कर्मकें अस्थि-संचय कहलनि...। ...दलान पर सभा बैसल आ ओहीमे अगिला कार्यक्रमक योजना बनल । पढ़ुआ कक्का तकरा अरसट्ठाकहलनि । निर्णयानुसार वृषोत्सर्ग श्राद्ध सौंसे पाली ल’...तदनुसार निर्धारित योजनानुसार काजमे गति आबलगलैक। ई तारीख भरिसक 22 दिसम्बर छलैक ।
ओहि समयमे घरक सभसँ छोट नेना हमहीं रही आ काज लेबाक दुआरें हमरे बुधियार-होसियारक पदक पहिरा देने रहथि से हम बुझियै, मुदा साइकिलक लोभ हमरा आर ऊर्जावान बना दैत छल ।
भेलाहीसँ पाँच-छओ किलोमीटर पूब बभनगामा पड़ैत छैक। ई दाम्मपत्य गाम थिकै- वीणा-बभनगामा’...। आब अन्दौली सेहो फेंटम-फेंट भगेलैक । बभनगामामे तहिया बहिन, दीदीक सासुर आ पिताक मातृक रहनि । ओझाजी, पीसा आ राजो कक्का दूधक व्यवस्था ओत्तहि करबाक भार नेने रहथि । संवादवारीक लेल हमहीं जाइत रही ।
बभनगामा जेबाक दू टा बाट हम टेबने रही । कीर्त्तन भवनसँ सोझे पूब रेलवे लाइन पार करैत पहिने वीणा, तखन बभनगामा । दोसर बाट हमरा मोन पर छल...। बजार घुमबाक, स्टेशन देखबाक मोन होइत छल तओही बाटे ।
26, दिसम्बरकें गाममे घोल भेलै जे बरुआरीक लाल साहेब मरि गेला । गामक तहसीलदार रामजी मल्लिक एकर पुष्टि कयलनि । हमर जिज्ञासा बढ़ल...बभनगामा जेबाक क्रममे साइकिल स्टेशनक बाट धेलक...।
लाल साहेबक कोठीक कैम्पसमे लोकक करमान मृत्युक सत्यताकें पुष्ट कदेलक । पूबरिया बरण्डाक पलंग पर दुनियाँ भरिक निन्नमे मातल लाल साहेबक सौम्य आ शान्त देहयष्टि एखनो बहुत विलक्षण लागल रहय...सुनलियै, कहाँदन रातिमे जे सुतला से सुतले रहि गेला ।
मुदा परसरमा स्टेशनक नाम बदलबाक लेल जे ओ मोकदमा कयने रहथि, तकर निसाफ सूतल नहि रहल आ अन्ततः 1963 ई॰ मे परसरमाक स्थान पर गढ़-बरुआरीक नामपट्ट लगबाक ऐतिहासिक फैसला भेलै...लाल साहेबकें एहि निर्णयसँ निश्चिते शान्ति भेटल हेतनि...।
परसरमामे पचमुहानक प्रमुखता अछि । आब तओ जगह बहुत विकसित भगेल छैक । एही प्वाइन्टसँ लोक पूब बरुआरी, जगतपुर, एकमा-बभनगामा-वीणा-अन्दौली होइत सुपौल चल जाइत अछि । पच्छिम जाइत सड़क बलहा, सोल्हनी, सीहे, बकौर आ बान्हक –
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- भीतर चनैल चल जाइत अछि । उत्तर सुपौल, दच्छिन सहरसा आ बलहा सड़कक पाँजरे-पाँजर जाइत सड़क गाम चल जाइत अछि ।
सुपौल दिस नमरैत सड़क मल्हनीक बाद कर्णपुरक तीनमुहान छुबैत अछि । ऐ तीनमुहान पर बहुत पुरान एकटा इनार छै । आब तओतएकटा भव्य मंदिरो बनि गेल छैक । इनार तएखनो चालू छै ।
ऐ तीनमुहानसँ पच्छिम एकटा टोल छै खरैलजे एहि परोपट्टाक छलै आ परगन्ना छलै मल्हनी गोपाल । गोपालकिए जुटलै से हमरा एखनो धरि नहि बूझल भेल अछि । भेलाहीक डाकघर खरैले छै...।
कर्णपुर तीनमुहान पर अवस्थित मंदिरक पाँजरे-पाँजर दक्षिण सड़क जे नवहट्टा कें छूबैत छै, कर्णपुर एही पथक पहिल गाम थिकै । एकर शुरूहे मे सड़कक पच्छिम स्कूल, पूबमे कतिका कुमरक मंदिर आ तकरा आगाँमे कृष्ण मंदिर जतय भोर-साँझ गौंआक गेट-टूगेदर होइत रहै छै । एहि गामक कृष्णाष्टमीमे मधुरक नाम पुरुकिया (गुझिया) बनैत छै जे खूब स्वादिष्ट सनेस बनैत छै । कर्णपुरक कृष्ण-पूजाक उत्साह एहि गामक संस्कृति थिकै ।
स्वाधीनता संग्राममे बढ़ि-चढ़ि कभाग लेनिहार कर्णपुर विचारें-व्यवहारें आ संस्कारें अदौसँ उन्नत ओ व्यवस्थित गाम मानल जाइत अछि । स्वनामधन्य लहटन चौधरी आ लाल बाबा अंग्रेजी सरकारसँ मारि खेनिहार आन्दोलनीक पहिल लोक रहथि जे भारत माताक जयक नारा लगेबाक कारणे लाठीसँ ओधबाध कैल जाइत रहला...ई दुनू विभूति आइयो आन्दोलनक प्रतीक मानल जाइत छथि । स्वतंत्र भारतमे चैधरी जी कतेको बेर विधानसभा आ लोक सभाक प्रतिनिधित्व कयलनि । लाल बाबाक लाल वस्त्रक एक-एक सूत जा ओ जीलाह भारत माताक असली प्रतिनिधि बनि जीलाह ।
कर्णपुरक दच्छिन सीमान पर एक टिहुली अछि उन्नतोदर, गजपीठ ऊसर भूखण्ड...। यैह ओ जगह थिक जतय अंग्रेजक निर्णयक विरुद्ध नोन बनाओल गेल छल । सत्याग्रहीकें पुलिसक बर्बरता सहपड़ल छलै...।
एही भू-खण्डक बीच बाटे एकटा एकपेड़िया बनल अछि पच्छिम दिस । एहि एकपेड़ियासँ आवाल-वृद्ध-वनिताक मधुर स्वरमे बान्हल नचारी, महेशवाणी अनुगुंजित होइत बाबा तिलहेश्वर नाथ महादेवक दरबार पहुँचैत अछि नितः । विशेष करवि कें...।
एकर सटले दच्छिन अछि सुखपुर । विलियम्स हाइस्कूलक बाद निर्मित हाइस्कूल सुखपुरक प्रतिष्ठा अछि । हमर बालसंगी दिलीपक गाम आ बच्चा भैयाक सासुर । आम आर लुच्चीक औद्योगिक नगरी । सुखपुर है सुखधाम, जहाँ बिराजे लुच्ची आम । एतुक्का दुर्गापूजा आ दुर्गाक भसाओन अत्यंत आकर्षक आ औत्सुक्यसँ भरल होइत अछि ।
मुदा कर्णपुर शीर्ष गाम होइतहुँ आइधरि हाइ स्कूलक स्थापनामे पछुआयले रहल ।
...हँ, हम तीनमुहान पर ठाम अपन गाम भेलाहीकें अखियासै छी...। ओतसड़कक स्वरूप तीरे सन छै । नोक भेलाही, सुपौलकें छूबैत छैक । सुपौलसँ पहिने हमर पोस्टल एड्रेस अछि- मौजा-खरैल, टोला-भेलाही...हमर ई टोल, टोल नहि रहल- गाम भगेल । टोलाक कन्सेप्टआब बदलि गेलै...। टोलक व्यवहार आब नवतूरक लोक नहि –
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- करैए...। बुझलो नहि छै...गाम-घरमे टोलआब दिशासूचक छैक...पूबरिया, पछबरिया, उतरबरिया आ दछिनबरिया । अर्थात गामक विभाजन टोलमे आ शहरक विभाजन मोहल्लामे...छोट शहर वार्ड आ पैघ शहर सेक्टरमे बँटा गेल अछि । आजुक तिथिमे हमर गाम सुपौलमे अन्तर्लीन भगेल अछि आ एकटा स्वतंत्र वार्ड-19 बनल अछि ।
टोलसँ गाम, गामसँ वार्ड बनल भेलाहीअपन सीमामे अपनाकें विकासशील बनेबामे प्रयत्नशील अछि । एहि क्रियामे सुपौल पर निर्भरता बढ़ि गेल छैक जे स्वाभाविको अछि ।
मेन रोड एहि गामकें बीचो-बीच चीड़ैत सुपौल छूबैत अछि । ई हम अपना जहियासँ ज्ञान-प्राण भेल, तहियेसँ देखैत आयल छी । सड़कक दुनू कात बसल एहि गामक लम्बाइ बेसी आ चैड़ाइ कम अछि...। बाँस-काठ आ खढ़क कमी नहि रहबाक कारणे प्रायः सभ टोलक घर खढ़ेक बनैत रहलै । खाली उतरबरिया सीमा पर बुद्धू ठाकुरक घर पक्काक छलै...। गामक निम्न मध्यवित्त आ मध्यवित्त बहुल परिवार अपन-अपन हिस्साक श्रम पर भरोस राखि निर्वाह करैत छल । कदन्न आ सुअन्न एतसभ दिन उपजैत रहल...हर-बड़द पर निर्भर ई गाम पशुक सेवामे सदैव अग्रणी रहल...गौपालन आ महिसपालन एतआमदनीक माध्यम रहलै...। बकरी-छकरी पोसब सेहो सौखसँ बेसी आमदनीकें बढ़बैत छल । यैह कारण छल जे बूढ़ा सभक लगाओल सड़कक कातक गाछ कहियो छिपगर नहि भसकलै...
हमरा गाममे अदौसँ बाढ़ि अबैत रहलै...माटि परिवर्त्तनसँ उपजा नीके-ना होइत रहलै...। श्रमशील लोक अपना नीने सूतय आ अपना नीने उठै...। जे एहिसँ अलग किसिमक लोक छल ओकर लेल रिनं कृत्वा घृतं पीबैतसिद्धान्तक आश्रयी छल । पारंपरिक खेतीक संग-संग ठाकुरजीक ट्रैक्टर-थ्रेसर बेसी काज करै...हमरा गाममे सुकरातीक पखेब आ सीरपंचमीमे हर ठाढ़ हैब एखनो आकर्षक लगैत छैक...।
गामक पछबरिया टोलमे बसल ब्राह्मण अपन धर्मक रक्षा करैत पुबरिया आ दछिनबरिया टोल पर निर्भर रहल...अपन शालीनता आ सद्व्यवहार हिनका लोकनिकें कहियो उठल्लू नहि होमदेलकनि...मर्यादा ग्राम्य संस्कृतिक अनुरूप एखनो अछि ।
...हमर जन्म 6 जनवरी 1947 ई॰क माघ-फागुनमे भेल । इहो तखन बुझलियै जखन हाइर सेकेण्ड्री उतीर्णक सर्टिफिकेट पर अपन जन्मतिथि अंकित देखलियै।
तहिया गार्जियन अपन जेठ संतान मात्रक टिप्पणि बनबैत रहथि । शेष संतानक जन्मकुण्डली गामक मास्टर साहेबक हाथमे रहनि । बही पर लिखल तिथि जन्म भरिक लेल स्थायी...। हम अपना माता-पिताक चारिम पुत्र आ सभ भाइ-बहिनमे छठम स्थान प्राप्त कयने रही...।
हम सभ भाइ-बहिन मिला कमाता-पिताक सात संतान..। दू बहिन आ पाँच भाइ । एहिमे हमरासँ पैघ तीन अग्रज आ दुइ अग्रजा...। एहन स्थितिमे पैघ भ्राता कें छोड़ि शेष हमरा लोकनिकें बिना टिप्पणिक अपन-अपन जीवनपथ पर चल पड़ल । ज्ञात-अज्ञातक झंझटिसँ एकदम मुक्त...भगवती जे करथि....


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साभार संदर्भ

भारती मंडन, अंक-13 (नवक्रमांक-1), जनवरी-जून, 2017
संपादक : केदार कानन
प्रकाशक : कामाख्या झिंगुर साहित्य कला परिषद, मलाढ आ किसुन संकल्प लोक, सुपौल

[लगभग एक दशक बाद ‘भारती-मंडन’क प्रकाशन फेरसँ शुरू भेल छैक। नवांक-1 (अंक-13) फेरसँ अपन बहुआयामी व्यक्तित्वक संगे पाठक लोकनिक बीच छैक। एहि अंक मे उपयोगी आ बेस महत्वक कतेको सामग्री प्रकाशित भेल छैक। मैथिली मंडनक ई प्रयास रहत जे एहेन किछु सामग्री एतय उपलब्ध कराओल जाए। महेन्द्र जीक प्रस्तुत रचना एहि प्रयासक एक कड़ी थिक।]