Tuesday, December 12, 2017

अपन अयनामे धूमकेतु : धूमकेतु

मैथिली कथा साहित्यक एकटा प्रतिष्ठित नाम थिक- धूमकेतु । हुनकर एतय प्रस्तुत कएल जा रहल आत्मकथ्य केँ महत्वपूर्ण मानबाक कतेको कारण छै । एहिसँ धूमकेतु, हुनक निर्माण, हुनक परिवेश, हुनक दृष्टिकोण आ हुनका बहाने मैथिली साहित्य आ मिथिलाक इतिहासक कतेको आन प्रसंग केँ जानबाक अवसर भेटैत छैक । एहि आत्मकथ्यक सबसँ पैघ विशेषता छै, धूमकेतुक स्पष्टवादिता आ रचनात्मक ईमानदारी । धूमकेतु अपन सामंती संस्कार आ ताहिसँ निकासक छटपटाहटि केँ तँ स्वीकार करिते छथि, अपन पिताक व्यक्तित्व केर द्वैत्व केँ साफ-साफ प्रकट करबा सँ सेहो, हुनका कोनो परहेज नहि छन्हि । धूमकेतुमे आत्ममुग्धता आ आत्मप्रचारक प्रवृत्तिक नितांत अभाव देखार पड़ैत छैक, जकरा सामान्य मैथिल संस्कारक अपवादे कहल जा सकैत अछि ।  
एहि आत्मकथ्यक पहिल प्रकाशन कतय भेल छलहि, वा एकर मूल स्रोत की थिकै, से हमरा नहि बूझल अछि, मुदा एतय स्रोतक रूप मे देसिल बयना’, हैदराबादक जाहि स्मारिकाक उपयोग कयल गेल छैक ताहि मे एकरा राँचीसँ प्रकाशित पत्रिका ‘रचनाक अक्टूबर-दिसम्बर2003 अंक (पृष्ठ 4-6) सँ साभार लेबाक सूचना देल गेल छैक ।

अपन अयनामे धूमकेतु
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धूमकेतु


[पृ.-51]
जन्म हमर एहन परिवारमे भेल जतए समय बिताएब पहाड़ रहै छै । शरीरसँ कोनो काज करब हीन ओ करबाएब चतुरता मानल जाइत छैक । तज्जन्य हानि तँ बहुत भेलए एकाधटा लाभो  देखैमे अबैत अछि । जेना अखराहापर छड़ीक हाथेँ पठाओल गेल छी । मामूली गायन कियो अशुद्ध कऽ लेता तँ से नै बुझैमे आओत, से बात नै । आ सभसँ पैघ लाभ जे खिस्सा-पिहानी, पुस्तक- पत्रिकाक सान्निध्य बड़ नेनासँ रहल । पहिल शिक्षक छला - रानी टोलक पंडित घनानन्द झा । लोटा शब्दक सन्धि-विच्छेद धरि ओ मोन पड़ैत छथि । विद्या-व्यसनी केहन छला जे हुनक  लिखल घटकराजगोत्र-मूल-पाँजि आदि-आदि लौकिकताक पोथी घर-घर पहुँचल । अक्षरक ज्ञान हमर माइयोकेँ छलनि । पिता एकटा प्रेस संचालन करैत छला । विचारसँ गाँधीवादी छला, क्रियासँ सामन्त, तेँ शरच्चन्द्र आ प्रेमचन्द्र हमरा बहुत नेनासँ उपलब्ध होइत रहला । चाँदक फाँसी अंक हम पिताक तकिया तरसँ चोरा कऽ माइक सेवामे प्रस्तुत कऽ चुकल छी । हमरा लगैत अछि, अइसभ वातावरणक प्रभाव हमरा अवचेतनमे साहित्यक प्रति लगावकेँ जन्म देलक । तेँ फरिछा कऽ कहबो केलौं । तकर बाद जे मोन पड़ैत अछि, से अही लगावक विस्तार । 

राज इसकुल दरभंगाक जीवन पहिले पहिल मैथिली शब्दसँ परिचित  करौलक । हमर बाल-मन अवश्य गौरवान्वित भेल छल जे ओ जे हम बजै छी, एकटा भाषा थिकैक । कुमार गंगानन्द सिंहक आवास सचिव सदनकहबनि । प्रायः अइ लेल जे ओ महाराज दरभंगाक आप्त सचिव छलथिन । राजेक बंगलामे रहैत छलथिन । बड़कीटा नेमप्लेटक नीचाँमे रईस, श्रीनगरलिखल छलैक, ‘आप्त सचिवनै । कुमार साहेब बिहार राज्य हिन्दू महासभा आ नैशनल वार फ्रन्ट, दुनूक राज्याध्यक्ष छला । संगहि तत्कालीन जे साहित्यकारलोकनि छलाह तनिक आवागमन निरन्तर होइत रहनि । जे सचिव सदनक छात्र बाटहुमे भेटैत रहलाह ताहिमे हीरानन्द शास्त्री (आर्यावर्तक पूर्व सम्पादक) आ जितेन्द्र किशोर झा (टिस्कोक जनसम्पर्क अधिकारी) स्मरण अबैत छथि । जहाँ धरि मोन पड़ैत अछि, रचैक स्पृहा जेना ओइ बएसमे सभकेँ होइत छैक, हमरो भेल । महाराजाधिराज, दोसर विवाह मंगरौनी केने छला आ दरभंगासँ मधुबनी धरि स्पेशल ट्रेनमे बरियाति साजि कऽ कोबर करए मंगरौनी जाइत छला । ताहि शुभ अवसरपर आदरणीय गोलोकवासी मधुपजी कोबरगीत लिखने छला आ महाराज पाँच सए टाका पुरस्कार देने छलथिन । अयनामे जे पहिल हर्षित चेहरा उभरैत अछि, से अही बातपरक । प्रभाव केहन जे ओ रचना जे हम तत्काल प्रारम्भ कऽ देने रही सरकारमे दाखिल करैक लेल, तकर पाँती एखनो मोन अछि, यद्यपि अर्थ लगेबामे अपनो असौकर्य होइत अछि –
अहि-रिपु-पति-तिय सदसानीन
उर- माला- कर- शोभित  बीन
गोपी   –  वल्लभ   श्रीभगवान
रचल  काव्य  धय हुनके ध्यान
ई नै बुझि लेब जे ई पाँती हमर मा निषाद प्रतिष्ठांथिक । डंड-बैसक पहिनोसँ प्रारम्भ छलैक ।

ओहि समयक एकटा घटना मोन पड़ैछ । बीचमे ई बुझि लेबाक थिक जे सचिव-सदन साहित्य आ भाषा - हिन्दी आ मैथिली - दुनूक केन्द छल । दिनकर आ राजा राधिकारमण अधिक काल पाहुन होइत छला । आचार्य रमानाथ झा, डॉ. सुभद्र झा, पंडित जयदेव मिश्र घंटो ओइ विवादमे प्रत्येक दिन शामिल होथि जे मैथिली वा हिन्दी भाषा-साहित्यक अभ्युन्नतिक लेल [पृ.-52]होइक । ताही दिनुक एकटा आर चित्र उभरैत अछि । शिशु मैथिली साहित्य परिषदक स्थापना दरभंगामे कयल गेल छलैक । उद्येश्य छलैक गामक प्राइमरी स्कूल धरि मैथिलीक चेतना जगाएब । मधुबनीमे प्रथम सम्मेलन भेल छलैक । अध्यक्षता केने छलाह प्रयाग विश्वविद्यालयक राजनीति विभागक छात्र पंडित चेतकर झा आ स्वागताध्यक्ष छलाह राँटीक श्रीमान् बाबू साहेबक बालक । जहाँ धरि हमरा मोन अछि, प्रायः 1945 ई. मे । हमरालोकनि राज स्कूल दरभंगासँ डेलीगेट भऽकऽ गेल रही - मणी भायक नेतृत्वमे । कवि-गोष्ठी आयोजित भेल छलैक । हमर रचना जे शास्त्रीजी गढ़ि देने छलाह, से ट्रेनसँ पौदानपर यात्रा करैक हीरोपनीमे उपरका जेबीसँ कतौ उड़ि गेल । स्मरणसँ हबड़-हबड़ लिखि तँ लेलौं मुदा बात जमलै नै ।

अही सभ कूद-फानमे भेलै जे आइसँ हमसभ आजाद । ने लाहौर हमर, ने ढाका । छौंड़ासभ साँस छोड़लक चल भाइ, परीक्षामे भारतक नक्शामे लंका-वर्मा छुटि गेने आब नम्बर नै कटतौ ।

स्वातंत्र्योत्तर काल हमर वैचारिक स्थिरता काल छल, तेँ उद्वेलनो चरमपर छल । अही कालमे हमरा लागल छल जे आचार्यलोकनिक देखाओल उद्येश्य आब काव्यक नै भऽ सकैत अछि । शोषण-उत्पीड़न केर अर्थ बुझऽ लगलियैक । बताह पतिक संग एकसरि रहैत बहिनिक सुख-दुख देखलियनि । ओइ विशाल सामन्ती परिवार, जकर पूर्वमे चर्चा कएल अछि, तकर धूरीमे अपन माए देखा पड़ली । गंगाइक पीठपर हमर गाँधीवादी पिता द्वारा बरिसाओल छड़ीक दागपर माएक देल नारिकर तेल लऽ जाइत हमरा कोनो विद्रोहक भाव मोनमे आएल हो, से नै मोन पड़ैत अछि । मुदा हम जाहि कालक जिक्र कऽ रहल छलौं, ताहिमे हमर मन ई निश्चित रूपसँ मानि लेलक जे हमरालोकनिक उद्धारक मार्ग मात्र मार्क्सवादी चिन्तनधारा भऽ सकैत अछि । उद्धारसँ हमर तात्पर्य दूटा अछि - पहिल, प्रचलित जीर्ण सामाजिक मूल्यसँ जे समसामयिक विडम्बनाक व्याख्या नै कऽ सकैत अछि आ दोसर जे मनुक्ख स्पष्ट रूपेँ मनुक्खक रूपमे स्थापित हो ।

अयनामे जे चेहरा उभरैत अछि, से हाटक गाछीमे टएर गाड़ीपर ठाढ़ भऽकऽ बहुत फड़कैत अल्फाजमे बहुत आग्नेय कविक वा सकरीसँ जयनगर धरि बिना टिकटक यात्रा, ‘जनशक्तिक प्रति बेचैत, नौटंकी स्टाइलमे शेर पढ़ैत कविक । अही कालमे मैथिलीसँ संग छुटि गेल । कतए की भऽ रहल छैक, उत्सुकतो खतम भऽ गेल । किछु उल्लेखनीय भैयो नै रहल छलैक । अही कालमे आदिवासी क्षेत्रमे कार्य करैत हमरा अनुभव भेल छल जे मातृभाषा कतेक महत्त्वपूर्ण थिक । कानून बना कऽ अंग्रेज अंग्रेजीएमे राजकाज चला गेल । मुदा, मनुक्खक जाहि मुक्तिक चर्चा हम ऊपर कएल अछि, से बिना मातृभाषाक कोना हएत? हमरा, मैथिलीमे एकटा सांस्कृतिक क्राइसिसक बोध अही कालमे भेल छल । मिथिला-मैथिल-मैथिली - हमर बाल मनपर ई अभिलेख छल । आ एकर उपयोगिता लोकक संग काज करैत काल बुझने छलियैक । हम आइयो एहि बातकेँ मानैत छी जे, जँ मिथिला तँ ताहिमे रहैवला मैथिल आ तनिक भाषा मैथिली । जनतंत्रमे सरकारो अही क्रममे जन तक पहुँचि सकत आ जन सेहो अपन सरकार अपने बना सकता । अही मानसिक स्थितिमे हम आज पावस की निशा में फिर तुम्हारी याद आई सँ बाहर भऽकऽ ई देवता छथि पाथरक खएता मुदा मिष्टान्न हलुवाधरिक यात्रा केने छलौं ।

तकर बादक जे अयना अछि ओहिमेक चेहरा सभकेँ देखा पड़ैए । हम बलौं ओकर बखान करी, बहुत झंझट ।

सभ छान-पगहा तोड़ि-ताड़ि जखन हमरा अपन पारिवारिक ताना-बाना आर्यावर्तक उपसम्पादकी छोड़ा कऽ जनकपुर पहुँचा देलक, आटा-दालिक भाव बाजारमे बूझब अनिवार्य भऽ गेल । ता मिथिला मिहिरसेहो उपलब्ध भेल । मिथिला मिहिरमाने एहन अयना, जाहिमे सभक चेहरा झक-झक देखाइए । ओकर फाइलसँ ई बात बुझल जा सकैत अछि । हमर चेहराक रंग बदलल लागत 1965क बाद । ओतय हम अपन मौलिक रूपमे छी । जे संचित अर्जित लबादा छल, प्रायः हम ओइसँ बहरेबाक यत्न करैत रहल छी । सीता, जे हमरालोकनिक आदर्श थिकी, ओ समस्त मैथिलानी जातिकेँ आइ दुर्गतिक पराकाष्ठापर पहुँचा देने छथि ।  प्रत्येक मैथिलानीमे जीबैत [पृ.-53]सीताक समर्पण-भावनाकेँ अपमानित-लांछित होइत देखि कऽ हम चुप नै रहल छी - 1951मे प्रकाशित अपन दीदीकथासँ लऽकऽ आइ धरि ।

स्वजातिकेँ वस्तु बनाकऽ ओकरा संगेँ पशुवत व्यवहार हमरासभक एहन परम्परा थिक, जाहि दिस कनेको ध्यान नहि जाइत अछि - नै, स्त्रीजातियोक नै । अही वितंडावाद सभपर प्रकाश दैत एकटा कविता लिखने रही - एक बेर फेर राजधानीमे ।भीम बाबूकेँ देलियनि । मुदा ओ जब्त भऽ गेल । दू वर्षक बाद देवीजी हटली तँ भीम भाइकेँ प्रकाशित करैक अनुमति भेटलनि । अनुमतिक बातपर एकटा आर बात मोन पड़ैत अछि - अगुरबानक प्रकाशनक बाद जे पत्र आयल ताहिमे एकटा ललितजीक सेहो छल । लिखने छलाह - मनुक्खमे कतौ देवतो छैक, तकरो अन्वेषण हेबाक चाही ।प्रतिक्रियास्वरूप एकटा खिस्सा लिखाएल - मनुक्खक देवता ।अइ बेर सरकार नै, प्रकाशक जब्त कऽ लेलनि । ओ हेराइए गेल । बहुत बाद भऽकऽ संयोगसँ ओकर प्रति भेटल, तेँ बाँचल  । जे-से ।

प्रायः 1966-67मे आदरणीय किसुनजी सुपौलमे आधुनिक मैथिलीक शंख फुकने छलाह । हम प्रारम्भसँ पत्राचार द्वारा समस्त कार्य-कलापसँ जुड़ल रहलौं । मुदा ऐन अधिवेशनक समय हमरा अगत्या सिमरियामे बिताबए पड़ल छल । मुदा धीरू बाबू (प्रो0 धीरेश्वर झाजी) हमर एकटा कविता लऽ गेल छलाह आ सभामे बाँचनौ छला । जे प्रतिक्रिया कहैत आएल छला ताहिसँ हमर अद्यावधि विश्वास अछि जे कविताक संवेदनशील श्रोताक मादे सुपौल सभसँ आगू अछि । सुपौल नै जा सकबाक मजबूरी अन्ततः हमर मूक भऽ जेबामे फलित भेल छल । जँ अनिवार्यतः शब्द वापसो आएल तँ अनिवार्ये कार्यक हेतु । वैह मजबूरी हमर व्यक्ति, दृष्टि, रचनासभसँ परिलक्षित हएत।

अयनामे  हमर एकटा नव चेहरा  उभरैत लगैत अछि ।  एकटा प्रौढ़ धूमकेतुक ।  समस्त  घृणा-उपेक्षाक बीच भगजोगनी जकाँ अपनेमे जरैत धूमकेतुक । एहन धूमकेतुक जनिक चेहरा सभकेँ स्पष्ट देखाइत छनि । अपनेसँ व्याख्याक आवश्यकता की? मित्रगणक विशेष चर्चा हमरा कखनो अभीष्ट नै रहैत अछि । ओना बाबा आ अपन बीचमे हमरा दूटा धूमिल चेहरा अयनामे झलकैए - माथुर आ राघवाचार्य । मुदा हम, ने मैथिली साहित्यक अध्येता छी, ने ओकर इतिहास-भूगोलक ज्ञाता । जे रचै छी से मैथिलीमे, कारण हमर जे रचना-उपकरण छथि, जनिक हमरा प्रत्यक्ष ज्ञान अछि, से मैथिल थिका आ मैथिली बजै छथि । तेँ हमर दृष्टिदोषक व्याख्या तँ कोनो मैथिलीदाँए कऽ सकता ।

अयना- 2
 जैनेन्द एकटा महाग्रन्थ लिखने छथि - समय और हम। मोनमे अबैत अछि, समय तँ हमरहुसँ गुजरल अछि । एकटा निश्चित तिथिकेँ जे प्रकट भेल से समयसँ बाहर जाएत कतए? आ कालेक एकटा निश्चित अवधिमे तिरोहितो भऽ जाएत । मतलब जे समयसँ मुक्त क्यो नै अछि । अवतारो नै, मसीहो नै । हम तँ कहब जे कालदंशे व्यक्तिकेँ भाववाचकताक अभिव्यक्ति दैत छैक, ‘त्वजोड़ि कऽ ।

जे-से । मुदा ई अधिक काल होइत रहैत अछि जे मैथिलीक ओ कोन दंश थिक जे हमर अनन्य घूमकेतुकेँ प्रकट केलकनि, आ हमरा व्यक्तिकेँ एकटा त्वदऽ देलक। कथा-कविता तँ नै आ जे बहुत गम्भीर आलेख तँ सैकड़ो प्रस्तुत केने हएब । मुदा ओ सभ हमर थिक, घूमकेतुक नै थिकनि, घूमकेतुक त्वहमरासँ प्रखर छनि । मुदा डंक तँ हमरे लागल अछि । की थिक ओ?

रोटी कमा लैक लेल जे भाषा सहयोग देलक से हँसी लागत, अंग्रेजी रहल अछि । लीखि-बाजि लेबाक लूरि मजबूरी ।

 तखनि? मैथिलीक ई दंश? आ जहर आपादमस्तक व्याप्त? हमरा लागल एकर उत्स, कतौ ने कतौ कालप्रवाहमे अवश्य हेबाक चाही ।

मधुबनी शहरमे लघुसिंचाई योजनक जे ऑफिस छैकततएसँ लऽकऽ करीब-करीब पुल [पृ.-54]धरि टटघरमे स्थापित एकटा प्रेस छलैक, ‘मैथिल प्रिंटिंग वर्क्स। आइ कहि सकै छी जे ओकर  व्यवस्थापक हमर पिता छला । ताइ दिन नै बुझियै, ओ की छला, मुदा जे लोक आबनि, ताहिमे मैथिलीयो किताब छपाबैबला रहथि । स्वाभाविक छलै, जे-जे खिस्सा-पिहानी छपै, से एक प्रति हमरा माताकेँ उपलब्ध भऽ जाइनि । गोनू झाक चुटुक्का गोनू विनोदनामसँ छपल छलनि । प्रायः तीन कि चारि भागमे । दुपहरियामे ओकर परायण समय काटबाक पारिवारिक शगल रहैक, प्रायः ई पहिल दंश हो । कारण प्रारम्भिक प्रतिक्रिया हमरो यैह छल जे मैथिली हास्य-विनोदक द्वारा सरकारक मनोरंजनक अतिरिक्त आर किछु करबा जोग नै अछि । ताहि दिन ओही प्रेससँ माधवी-माधवछपल छलैक । हमरा मोन अछि, नायिकाकेँ अपहृत करैक चेष्टासँ पूर्व ओकरालोकनिक वार्त्तालाप हमर बहीनसभ बरमहल दोहरबैत रहथिन ।

अपना होइए जे ओइ दिनमे तँ बड़ नेना रही । हमर पिता पोन परक कलकलि कार्बोलिक साबुनसँ धो देता, ताहि लेल हुनका बहुत परिश्रम करबियनि । तखन फेर ई उपन्यास? मैथिली? ओना हमरा बुझने दंश ओही बएसक सभसँ कड़गर होइ छैक । तत्काल बोध नै हो, से बात फूट ।  हमरा तँ लगैत अछि जे राज स्कूलमे भर्ती भेलाक बाद मैथिलीक दोसर दंश कतौ अही लेल ने कहीं बेसी व्यापने होअए जे ओकरा प्रेसबला कालक जहरकेँ मात्र पुनः सक्रिय करऽ पड़लैक । राज स्कूलक वातावरण मैथिली केन्द्रित छलैक । ओकर प्रधानाध्यापककेँ हिन्दियो ने बाजऽ अबैन । ओना ताइ दिन स्कूलिंग केर प्रयास तँ सभ स्कूलमे रहै मुदा जाहि कालक राज स्कूलक चर्चा हम कऽ रहल छी, तकर जोड़ा नै रहै । ओइ स्कूलमे स्वभावतः राजसँ सम्पर्कित व्यक्तिक वार्डकेँ स्थान भेटैक, डिस्टिक बोर्डक मिडिल परीक्षाक सर्टिफिकेटक आधारपर । मायानन्द मिश्रजी छला, हमरालोकनिसँ बड़ सिनियर । संयोगात द्वितीय श्रेणीमे उत्तीर्ण भऽ गेला । विद्यालय त्यजन प्रमाण-पत्र हुनका पठा देल गेलनि, कैम्पसमे नै प्रवेश  पाबि सकला ।  ऑफिस एबाक चर्चा कोन! स्वैच्छिक-शैक्षिक अनुशासनक दृष्टिसँ एन.के. घोष सनक शिक्षक देखल नै ।

मैथिलीक मादे कहैत छलौं जे मैथिली स्वैच्छिक वातावरणक केन्द्रमे छलै । दरभंगा राजक दिससँ मैथिली भाषा-साहित्यक हेतु पटना विश्वविद्यालयमे रमेश्वर चेयरकऽ देल गेल छलैक । आठवाँ वर्गमे मैथिली, संस्कृतक विकल्प रूपमे स्वीकृत भऽ गेल छलैक । पं. जयदेव मिश्र, चं.मि. महाविद्यालयमे मैथिलीक व्याख्याता नियुक्त छला । पाठ्यपुस्तक दारिद्र्य-बोध उपस्थित छलैक । आ अइ समस्त वातावरण बीच शलाका-पुरुषक रूपमे छला - स्वनामधन्य कुमार श्री गंगानन्द सिंह । गणेशकेँ मैथिलीमे लम्बोदर कही कि गजानन, ताहिपर विवाद चलैक । योगा बाबू भलमानुसक पहिल प्रति लऽकऽ ओतहि उपस्थित भेल छला । गुरुवर अमरजीक गुदगुदीछपि कऽ ओत्तहि पहुँचल   छलनि । भांगपीने शेरमशेर भुअंकर त्रिपुंड, बहुत प्रखर जनौं, मुदा भुवनमोहिनी मुसकानबला फोटो फाइन आर्ट कॉटेजसँ बनि कऽ ब्लॉक बनैसँ पूर्व ओतहि प्रदर्शित भेल छलैक । बगलमे राजक विशाल पुस्तकालय, जाहिमे पंडित प्रवर रमानाथ झा जीक साधना । सात दिनपर एकटा कऽ मैथिली रचना नेने प्रकट होमऽबला राजगजटअर्थात् मिथिला-मिहिरसेहो, कम काल नै, वातावरणकेँ उद्वेलित कऽ जाइ । स्वनामधन्य सम्पादक पंडित हीरानन्द झा शास्त्रीक धुनिञाक खोजजहिया छपि कऽ आएल छलैक, प्रायः एक बेर कऽ सभ पढ़ने होएत ।

जाहि समयक चर्चा कऽ रहल छी - 42क आन्दोलनक झमाड़ अंग्रेजी राजकेँ हिला देने छलैक । सम्भव थिक, युद्धकालमे लागल छलैक, तेँ बेसम्हार भेल होइ । कुमार गंगानन्द सिंह हिन्दू महासभाक प्रान्तीय अध्यक्ष छला । तेँ हिन्दी-हिन्दू-हिन्दुस्तानबला वातावरण सभसँ मुखर छलैक । राजा राधिकारमण प्रसाद सिंह, कामेश्वर सिंह मस्तआदिकेँ पाँच दिन आबि कऽ रहबाक अवसर होइनि, शिवपूजन सहाय, रामधारी सिंह दिनकर’, पं0 जगन्नाथ मिश्र, प्रिंसिपल बी.एन.ए. सिन्हा  हिन्दी-हिन्दू-हिन्दुस्तानबला गोष्ठीक रत्न छला । मुदा ओइ कालसँ निःसृत एकटा आवश्यकताक रूपमे मैथिली एलै आ पूरा राज्यकेँ एहि बातक चिन्ता भेलै जे मैथिलीकेँ, ओकरा बढ़ाकऽ राखब चाहैत  छलैक । तेँ, मिथिला-मैथिल-मैथिली सेहो ओही सचिव-सदन मे रूप लैत छलैक । प्रभाव [शेषांश पृ.-62]आ हाथ रमानाथ बाबूक छलनि । कॉलेजक छात्र-संघो की करितय? सी.एम. कॉलेजमे पढ़ाइ छल - एकटा मात्र छात्र छल । स्मृतिसँ कहऽ कही तँ हम कहि सकै छी जे हिन्दी-हिन्दू- हिन्दुस्तान तुराइए तर पता नै कखनि हमरा ई जहर व्यापल । सम्भव थिक, प्रतिक्रिया भेल हो । मुदा हमरालोकनि एकटा अखिल भारतीय शिशु मैथिली साहित्य सम्मेलनक पहिल अधिवेशन मधुबनीमे कऽ छोड़ल ।
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स्रोत
मिथिला विभूति पर्व स्मारिका  (भोलालाल दास आ धूमकेतु पर केन्द्रित)  तेसर विशेषांक
हैदराबाद सिकन्दराबाद, 14 मइ2017
संपादक- चन्द्रमोहन कर्ण
प्रकाशक : देसिल बयना मैथिली साहित्य मंच,  हैदराबाद-सिकन्दराबाद

Monday, December 11, 2017

मैथिलीक समस्या : रमानाथ झा

रमानाथ झा मैथिलीक समस्या सब पर गंभीरतापूर्वक विचार करय वला विद्वान छलाह । एहि मादे लीखल हुनक कएक टा लेख मैथिली आ अंग्रेजी मे भेटैत छैक । प्रस्तुत कयल जा रहल लेख एक एहिने लेख थिक । एहि लेख मे मैथिलीक प्रति बिहार आ भारत सरकारक द्वेषपूर्ण व्यवहारक चर्चा छैक, मिथिलामे जन चेतनाक अभावक चर्चा छैक आ अन्यान्य कतेको महत्वपूर्ण बात छैक । एहि लेख मे मैथिलीक राजनीतिक अधिकारक प्राप्तिक आवश्यकता यानी अष्टम अनुसूची मे एकर प्रवेशक आवश्यकता पर बड्ड ज़ोर देल गेल छैक । लेख केर किछु बिंदु सँ असहमतिक गुंजाइश सेहो भ' सकैये, मुदा एहि बात मे कोनो संदेह ने जे मैथिलीक शोधार्थी आ जिज्ञासु पाठकक लेल ई महत्वक सामग्री छैक । प्रस्तुत लेखकेँ पढ़ैत हमरा सबहक लेल इहो विचारणीय हेबाक चाही जे आब जखन की मैथिली केँ अष्टम अनुसूचीमे जगह भेट गेल छैक, की मैथिली आ मैथिलीभाषी केँ ओ सब प्राप्त भ’ गेल छैक, जकर अपेक्षा रमानाथ बाबूक एहि लेख मे व्यक्त भेल छैक वा एहि दिशा मे बहुत बेसी गंभीरताक संगे मैथिल सामूहिकता बलें बहुत रास आरो काज करवाक आवश्यकता छैक? एहि लेखक प्रकाशन  ‘मिथिला मिहिर’क 31.08.1969 अंक मे भेल छलहि । संदर्भक लेल मोहन भारद्वाज द्वारा संपादित आ वाणी प्रकाशन सँ 2010 मे प्रकाशित  'रमानाथ झा रचनावली' क तेसर खंडक उपयोग सेहो कयल जा सकैत अछि, जाहि मे ई पृष्ठ संख्या 197 सँ 201 धरि प्रकाशित भेल छैक ।


मैथिलीक समस्या
रमानाथ झा

       चारि बर्ष पूर्व जखन साहित्य अकादमीमे मैथिलीकेँ स्थान भेटलैक ओ मैथिलीक प्रतिनिधि भए हम ओकर कार्यकारिणी समिति एवं साधारण सभासँ भए अएलहुँ तखन हम, 'मैथिलीक वर्तमान समस्या' कहि एक गोट छोट पुस्तिका लीखि प्रकाशित कराए देल जाहिमे मैथिलीक समक्ष जे समस्या हमरा सभसँ बिशेष मौलिक ओ मार्मिक, सबसँ आवश्यक, प्रतीत भेल तकर नीक जकाँ उपपादन कए शिक्षित समाजक ध्यान ओहि दिसि आकृष्ट कएने छलहुँ । सरकारक मैथिली-सम्बन्धी नीतिक चर्चा कए हम ओहि मे कहने छलहुँ -
"यदि मैथिलीक प्रति न्याय नहि कएल जाएत, मैथिलीक उपेक्षाक नीति यदि छोड़ल जाएत, राष्ट्रभाषाक बेदी पर मैथिलीक बलिदान व्यापार यदि बन्द नहि होइत अछि तँ आओर आन्दोलन तँ हमर साध्य नहि होएत, परन्तु अकादमिक मंच परसँ, जाहिमे भारतक कए गोट साहित्यिक भाषाक प्रतिनिधि छथि, ई तँ हम उद्घोष कए कहि सकैत छिऐन्हि जे मैथिलीकेँ अपना घरमे बिहार सरकार भूखेँ मारि रहलैक अछि, राष्ट्रभाषाक वेदी पर जनमतक विरूद्ध मैथिलीक बलिदान के रहल अछि ।"

ई हम 1966 मे लिखने छलहुँ । तहिआ सँ आइ धरि बिहार सरकारक नीतिमे कोनो परिवर्त्तन नहिए भेल अछि प्रत्युत श्री कर्पूरीठाकुरक सदृश मैथिली-भाषी जननेता बिहारक शिक्षा मन्त्रीक पदसँ बाजि गेलाह जे मैथिलीभाषी लोकक संख्या 'पचास लाख' होएत ओ लोकसेवा आयोगमे मैथिलीके स्थान "ओ नहि दए सकैत छथि ।" ओमहर केन्दीय सरकार जे एतेक दिन मैथिलीक हितक दिशामे जागरूक बुझि पड़ैत छल- कम सँ कम पण्डित जवाहरलाल तँ अवश्य मैथिलीक उद्धार कए देल- एमहर बिहारहिक सरकार जकाँ विरुद्ध नहि, तँ उदासीन अवश्य भए गेल अछि । गत वर्ष भारत सरकार भारतीय भाषा सबकेँ  विकासक योजना बनाए उन्नतिक पथ पर अग्रसर होएबाक हेतु पर्याप्त अनुदानक घोषणा कएलक ओ तदर्थ दिल्लीमे भारतीय भाषा समितिक स्थापना कएलक । ताहिमे मैथिलीकेँ स्थान नहि देल गेल । हम भारत सरकारक ओतए निवेदन कएल जे यदि भारतीय कोनहु भाषाकेँ केन्द्रीय सरकारक अनुदानक अपेक्षा छैक तँ से मैथिली थिक, कारण, मैथिलीकेँ अपन राज्य सरकार किछु मदति नहि करैत छैक । हमर निवेदन साहित्य अकादमी अग्रसारित कएलक । हम एकटा योजना सेहो बनाकए पठओलिएक जे दड़िभांग मे एक गोट मैथिली- प्रतिष्ठानक स्थापना कराए देल जाए जतएसँ मैथिलीक प्रकाशन होएत रहए ओ मैथिलीक उत्तम ग्रन्थ सभकेँ पुरस्कार देल जाए । मुदा शिक्षा विभागक राज्यपंत्री प्रो. शेर सिंहक उत्तर आएल जे "जेँ मैथिली संविधानक अष्टम अनुसूचीमे नहि अछि तेँ भारतीय भाषा समितिमे मैथिलीक समावेश सम्भव नहि अछि।" विचारल जाओ जे यदि अष्टम अनुसूची मे मैथिली रहैत तँ ई निवेदन करबाक अवसरे की होयत, तखन तँ अनुदान मैथिलीकेँ स्वतः प्राप्त रहितैक । प्रतिष्ठानक योजनाक प्रसंग उत्तर आएल जे -'चारिम योजनामे भाषाक प्रतिष्ठान राज्य-सरकारक क्षेत्रमे छैक तैँ एहि प्रसंगक निवेदन विहार राज्य-सरकारक ओतए कर्त्तव्य।'' साहित्य अकादमीक मान्यतासँ मैथिलीक मान्यताक प्रसंग कोनो अन्तर नहि भेल । बिनु राजनीतिक मान्यता प्राप्त भेने मैथिलीक उद्धारक दोसर कोनो मार्ग नहि अछि । बिहार सरकार राष्ट्रभाषा परिषदपर लाखक हिसाबें टाका व्यय करैत अछि, मुदा एतबा विवेक नहि छैक जे मैथिलीक हेतु किछु हजारो टाका दैक । बिहारकेँ मैथिलीक गौरव चाहिऐक मुदाविहारक राजनीतिक नेताकेँ एकर गौरव नहि, एकरासँ जेना द्वेष होइक !

अतएव हमरा अपन स्थिति समस्त देशक साहित्यकारकेँ जनाएब आवश्यक भए गेल । भाग्यसँ ताहि हेतु हमराअवसर बड्ड सुन्दर भेटल । गत 2 अगसतकेँ अकादमीक बैसक बेल छल सभापतिक निर्वाचनक निमित्त । देश भरिसँ सदस्यलोकनि अओताह तँ किछु विचार-विनिमय हो अकादमी एक गोट विचार-गोष्ठीक आयोजन कएलक तीन ओ चारि अगस्तकेँ जाहिमे ओहि तीनि भाषाक समस्यापर निबन्ध पढ़ल गेल तथा विचार-विनिमय भेल जाहि तीनि भाषाकेँ साहित्य अकादमी मान्यता देने छैक, अष्टम अनुसूचीमे नामो छैक, परन्तु जकारा अपन राज्य नहि छैक । एहन तीनि गोट भाषा छैक संस्कृत, उर्दू तथा सिन्धी।  हम एहि विचार-गोष्ठीक निमित्त मैथिलीक समस्यापर निबन्ध लीखि पठओलिऐक जकरा राज्य छैक मुदा सरकार नहि छैक, स्टेट छैक, गवर्नमेंट नहि छैक ।  सर्वसम्मतिसँ हमर निबन्ध स्वीकृत भेल तथा 4 अगस्तकेँ ओतए पढ़ल गेल । ओहि पर विचार-विनिमय भेल । गोष्ठीमे भाषा-सबहिक प्रतिनिधि तँ छलाहे, भारत-सरकारक मनोनीत सदस्य सेहो छला ह। हमर निबंध गोष्ठीकेँ ततेक पसिन्न पड़लैक जे ओतहि निश्चय भेल जे ई सम्पूर्ण निबंध अकादमीक पत्रिका  'इंडियन लिटरेचर'क अग्रिम अंकमे प्रकाशित भए जाए । बिहार सरकारक उपेक्षानीति ओ भारत सरकारक उदासीनताक हम ओहिमे स्पष्ट विवरण प्रस्तुत कएने छी ओ एहि कथाकेँ नीक जकां बुझाए देने छी जे बिहार-सरकार जानिकेँ मैथिलीकेँ राष्ट्रभाषाक  वेदी पर बलिदान कए रहल अछि । हमरालोकनि भाषाकेँ राजनीतिक प्रश्न नहि बनबए चाहैत छी । मैथिल हिन्दीक विरोधी नहि छथि । राष्ट्रीय एकताक हेतु हमरा लोकनि अपन प्राचीन लिपिक त्याग कए देल जाहि कारणें ई सब अनुताप सहए पड़ैत अछि । परन्तु मैथिली-विरोधी नीतिक फलस्वरूप यदि मिथिलामे हिन्दीक विरोधी आन्दोलन प्रारम्भ हो तँ तकर दोष मैथिलीभाषाभाषीकेँ नहि देल जाए; ताहि हेतु उत्तरदायी बूझल जाथि हिन्दी-साम्राज्यवादक पुजेगरीलोकनि जे आबहु बिहारकेँ हिन्दी-भाषी प्रान्त मानैत छथि ओ मैथिलीक अभ्युदयक प्रश्न अबितहिं भोजपुरी जो मगहीक प्रश्नकेँ आगाँ कए ओकर मार्गमे प्रतिबन्ध ठाढ़ करैत छथि । साहित्य अकादमीक मंचपरसँ ई उद्घोष हम सबकेँ सुनाए देल ओ आब जखन अकादमिक पत्रिका 'इंडियन लिटरेचर' मे ई प्रकाशित होएत तखन केवल भारतवर्षहिटामे  नहि, विश्वमे जतए कतहु भारतीय भाषाक आदर अछि सर्वत्र ई ज्ञापित भए जाएत जे भारतवर्ष एक भागक प्राचीन भाषा जकरा साहित्य अकादमीक मान्यता प्राप्त  छैक, जकर उत्कृष्ट रचना पर प्रतिवर्ष पुरस्कार भेटैत छैक, जकर बजनिहारक संख्या कोटिसँ कम तँ नहिए छैक, दू कोटिक लग पहुँचि जएतैक तकरा अपन राज्य बिहारक तँ कथे कोन, भारत सरकार समेत भूखें मारि रहलैक अछि। इएह थिक भारतवर्षक लोक कल्याणकारी राष्ट्र, इएह थिक भारतवासीक मौलिक अधिकार,इएह थिक भारतक राष्ट्रभाषा हिन्दीक साम्राज्यवाद! एही राष्ट्रभाषा हिन्दीक साम्राज्यवादक विरोधमे दक्षिणमे हिन्दीक वहिष्कार भए रहल अछि । एही साम्राज्यवादक दुष्परिणाम थिक जे राजस्थानी विद्रोहमे उठि ठाढ़ भेल अछि ओ अग्रिम वर्ष  साहित्य अकादमीक मान्यता प्राप्त कए अपनाकेँ स्वतंन्त्र घोषित कए रहल अछि ।

परन्तु हमर उद्घोषसँ मैथिलीक प्रति सभक सहानुभूति भेलैक, नैतिक बल प्राप्त भेलैक से अवश्य मुदा ताहिसँ आगाँ की फल होएतैक? गोष्ठीमे चारू दिशिसँ हमरा प्रश्न कएल गेल जे एहन जखन स्थिति अछि ओ बिहार विधान सभाक कम सँ कम एक तृतीयांश सदस्य जखन मिथिलाभाषाभाषी छथि तखन सरकार एहन उपेक्षाक नीति किएक रखने अछि, कोना रखने अछि? वस्तुत: प्रजातन्त्रमे राजनीतिक स्वत्वक रक्षा केओ अपनहि कए सकैत अछि । साहित्य अकादमी तँ साहित्यिक मान्यता देलक, ताहिसँ अधिक ओ की कए सकत? हमर एके टा उत्तर छल, बड़ छोट आ बड़ सोझ, जे हमराअपन भाषाकेँ राजनीतिक प्रश्न नहि बनबए जनैत छी । नहि तँ हमरा लोकनि हिन्दीक प्रचारक निमित्त अपन लिपिक त्याग करितहुँ? एहि उत्तरसँ ओतय तँ सब संतुष्ट भेल, हमरा लोकनिक उदार भावनाक प्रति आदर देखौलक, मुदा प्रश्नतँ इएह अछि सब समस्याक जड़ि । राजनीतिक मान्यता प्राप्त करब आब मैथिलीक हेतु नितान्त आवश्यक भए गेल अछि ओ राजनीतिक मान्यता प्राप्त करबाक हेतु मैथिलीकेँ राजनीतिक समस्या बनबए पड़त, ओहि हेतु राजनीतिक संघटन करए पड़त, राजनीतिक आन्दोलन करए पड़त । ई समयक प्रभाव थिक अथवा एहि तथ्यक जागि रहल चेतना थिक जे श्रीयुत ललितनारायण मिश्रक सदृश नव-मिथिलाक वरिष्ठ जन-नेता जे भारत सरकारक राज्यमन्त्री छथि सौराठ सभामे बाजि गेलाह जे मैथिलीक हेतु, मैथिलकेँ आब मिथिलाक राज्य ने मांगए पड़ए? हालहिमे लहेरिआसरायमे मैथिली प्रचार सेवाक संघटन प्रारम्भ भेल अछि । अपन भाषा-सम्बंधी अधिकारक हेतु अनशन आरम्भ भए गेल छल ओ सुनैत छी पुनः आरम्भ होएत । हम नहि चाहैत छी- हमर संस्कृति ई नहि कहैत अछि- जे एहि हेतु हम ककरो विरोध करी, परन्तु आन्दोलन चलि गेला उत्तर ओकर की रूप रहतैक से के कहि सकैत अछि! अपना घरमे अपन उपेक्षाकेँ देखैत ओ भारतक अन्य भागमे अपन-अपन भाषाक हेतु की-की भए रहल छैक से जनैत हमहि कोना कहब, केओ कोना कहत जे मैथिलीक अभिवृद्धिक कथा जाए दिय, मैथिलीक अस्तित्वहुक हेतु राजनीतिक अधिकार प्राप्त करब आदि आवश्यक नहि भए गेल अछि ओ ताहि हेतु यदि आन्दोलन करए पड़ए तँ सहो विधेय नहि थिक ।

परन्तु ई हताशाक विचार थिक, अन्तःकरणसँ हम आन्दोलनक पक्षमे नहि छी । हमरा लोकनिक जे संस्कृति अछि तकर जे संस्कार हृदयमे दृढ़ भए गेल अछि तकरा आब एहि वयसमे हटएबो सम्भव नहि अछि । हमरा लोकनिक संस्कृतिमे कर्तव्यपालनक शिक्षा अछि । कर्तव्यक पालन कएनहि अधिकार प्राप्त भए सकैत छैक । विश्वामित्र ओ वशिष्ठक उपाख्यान एकरे शिक्षा दैत अछि । युद्ध पर्यन्त कएलेँ वशिष्ठ विश्वामित्रकेँ ब्रह्मर्षि नहि स्वीकार कएल, ताहि हेतु विश्वामित्रके 'ब्राह्मण्य' प्राप्त करए पड़ल । यदि समस्त मैथिलीभाषाभाषी जन-समुदाय अपन भाषाक प्रति अपन कर्त्तव्य बुझे लागए तं संसारमे कोनो शक्ति नहि छैक जे हमरा अपन अधिकारसँ वंचित राखि सकए । अधिकार पाबि यदि तद्नुरूप कर्त्तव्यक पालन नहि करब तँ प्राप्तो अधिकार नहि राखि सकब-ओहिसँ च्युत भए जायब । ई कथा की हमरा कहए पड़त जे एक सए शिक्षित व्यक्तिमे एको व्यक्ति मातृभाषाक प्रति अपन कर्त्तव्यक भावना समेत नहि करैत छी । जे लोकनि नेता कहाए सभामे मंचपरसँ बड़का-बड़का व्याख्यान दैत छथि ताहूमे कए व्यक्ति मैथिलीक प्रति अपन कर्त्तव्यक पालन करैत छथि? कहैत छिऐक जे दू कोटि जनता मैथिलीभाषाभाषी अछि, मुदा दू कोटि जनताकेँ अपन मातृभाषा मैथिलीक प्रति गौरवक अनुभव करबाक अवसर दैत छियैक? हम तँ बुझैत छी जे मैथिलीक दीनता, दुरव्यवस्था, उपेक्षा-सब किछु अछि मैथिलीभाषाभाषीक अकर्मण्यताक कारणेँ, कर्त्तव्यक प्रति परांगमुखताक कारणेँ, अपनानमे नाना प्रकारक भेद-भावसँ सामूहिक चेतनाक अभावक कारणें। हम ककरहु अनुत्साहित नहि करैत छी, जतेक संस्था वा जे केओ व्यक्ति मैथिलीक हेतु जे कोनो कार्य करैत छथि किंवा जे कोनो आंदोलन करैत छथि; सबहुक प्रति हमर हार्दिक शुभकामना, अजस्र सद्भाव । मुदा सबसँ हमर एग गोट मात्र विनम्र निवेदन जे आओर जे आन्दोलन करैत जाइ ओहि संग एक गोट ईहो आन्दोलन कएल जाओ जे समस्त मैथिलीभाषाभाषी क्षेत्रमे, समस्त जनसमुदायकेँ आपागर जनताकेँ ई बुझाए दिऔक जे ओहो मैथिली बजैत अछि, मैथिली ओकरो मातृभाषा थिकैक, अपन भाषाक प्रति सबकेँ किछु ने किछु कर्त्तव्य छैक ओ ताहि कर्त्तव्यक पालन थोड़-बहुत अपन-अपन योग्यताक अनुसार सब केओ करए ।

हमरा तँ विश्वास अछि जे तेहन सत्य ओ सबल हमर पक्ष अछि ओ ताहि महामायाक नाम पर हमर भाषाक नाम अछि जे एकर हानि भए नहि सकैत छैक, एकर अभ्युदय अवश्यम्भावी छैक । हँ, यदि हमरा लोकनि जागरूक रहब, सचेष्ट रहब, ओ नीतिक मार्ग धएने चलब तँ ओकर गति द्रुततर होयत । जय मैथिली!
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Tuesday, June 6, 2017

दधीचि तर्पण : राम लोचन ठाकुर

मैथिली आंदोलनक अग्रिम पांतिमे प्रतिबद्ध योद्धा बनि डटल रहनिहार बाबू भोलालाल दास मैथिलीक सम्मान आ उत्थानक लेल अपन सर्वस्व झौंकि देने छलाह । ओ सांस्कृतिक चेतनाक स्तर पर मैथिल केँ व्यवहारिक रूपसँ पहिलबेर एकबद्ध केनिहार व्यक्तिमे सँ एक छलाह । प्राथमिक शिक्षासँ ल’ के विभिन्न विश्वविद्यालय धरि मैथिलीक स्वीकृतिक लेल कएल गेल हुनक संघर्ष अविस्मरणीय अछि । हम सब मैथिल हुनक ऋणि छी आ रहब । हुनका आ हुनक विचार आ काजकेँ (जे बहुत बेसी महत्वक छै) जाननय हमरा सब लेल आवश्यक अछि । एही भावनाक संग हुनका पर केन्द्रित किछु आलेखआ उपलब्ध भेला पर हुनकर लिखल किछु सामग्रियो प्रस्तुत करबाक चेष्टा रहत । एहि क्रममे ई दोसर आलेखक प्रस्तुति थिक ।   
एहि श्रृंखला मे बासुकीनाथ झाक पहिल आलेख परिचयात्मक छल । रामलोचन ठाकुरक लिखल ई दोसर आलेख विचार प्रधान छैक । एहिमे भोलालाल दासकेँ स्मरण करैत मैथिली मिथिलाक चिंतासँ ओतप्रोत कतेको आरो प्रसंग आयल छैक । लेखकभोलालाल दासक व्यक्तित्व आ कृतित्त्व सँ जतबा प्रभावित छथि ततबा मैथिलीसँ जुड़ल इतिहासक कतेको प्रसंग आ मैथिलक सामान्य प्रवृत्तिसँ खिन्नो छथि।
एहि लेखमे भोलालाल दासतँ भेटता लेकिन आनो किछु नवीन आ बहसक उपयुक्त जानकारी वा दृष्टिकोण भेटि सकैत अछि । जेना एहिमे लेखकक एकटा धारणा व्यक्त भेल छन्हि - जे रवीन्द्रनाथक लीखल ‘जन गण मन’ विद्यापतिक लिखल ‘जय जय भैरवि’ गीतक अनुसरण करैत लिखल गेल छैक ।  
ई स्पष्ट कए देनए आवश्यक अछि जे एहि आलेखक प्रस्तुतिसँ ई अर्थ नहि लगाओल जाए जे ‘मैथिली मंडन’ एहि आलेखमे व्यक्त प्रत्येक विचार वा धारणासँ सहमत अछि। एहि आलेखमे किछु बात निश्चित रूपें आलोच्य छैक। 
प्रस्तुत दोसरो आलेख हैदराबाद सँ प्रकाशित देसिल बयना स्मारिका (मई 2017) सँ साभार लेल गेल अछि ।*  

दधीचि तर्पण
राम लोचन ठाकुर
हमरालोकनि तर्पण करैत छी । प्रत्येक वर्ष करैत छी । मुदा जाहि विभूति लोकनिक प्रसादात हमरालोकनिक अस्मिता-अस्तित्व, तिनका बड़ सहजताक संग बिसरि जाइत छी । वस्तुतः हमरालोकनिक जातिए तेहने अछि । हमरालोकनि अपन मूलकेँ बिसरि अन्तर्राष्ट्रीय होएबाक कल्पना करैत छी, सपना देखैत छी । विश्वक प्रथम गद्यग्रंथ वर्णरत्नाकरतकलनि  महामहोपाध्याय हरप्रसाद शास्त्रीक शिष्य। प्रकाशित कएलक कोलकाताक एशियाटिक सोसाइटी । कविपति विद्यापति रजनी-सजनी लिखैत छथि, तेँ हुनको मोजर नहि देल । धन्यवादक पात्र छथि नागेन्द्र नाथ गुप्त महाशय जे मात्र गीतक संग्रहेटा नहि केलनि, तकर व्याख्याक संग बसुमतीसँ प्रकाशितो करबओलनि । विद्यापति सिनेमा बनल बंगलामे, 1937 ई. मे । ऋषि अरविन्द सर्वप्रथम ओकर अंग्रेजी अनुवाद केलनि । रवीन्द्रनाथ पदावलीक नकल भानुसिंहेर पदावलीलिखलनि । हिनक जन-गन-मन....गीत विद्यापतिक जय-जय भैरवि....क नकल थिक, सेहो बोध हमरा लोकनिकेँ नहि भेल । बंगभाषा ओ साहित्यक लेखक दीनेश चन्द्र सेन कहैत छथि जे बंगलाक सकल श्रेष्ठ कविक गुरु छथि विद्यापति । बंगला लिपिक उत्पत्तियो ओ मिथिलाक्षरसँ मानैत छथि । किन्तु हमरालोकनि एहन विलक्षण मिथिलाक्षरकेँ बिसरि देवाक्षरक अनुगामी भेल छी । कतेक कचोटक बात छैक जे 24 याजेन नाम आ 16 योजन चाकर एक भूखंड, जकरा इतिहास-पुराणमे विख्याता कहल गेल छैक, जाइठाम चारिटा दर्शनक रचना भेल छैक - तकरो बिसरा देल । विश्वक प्रथम गणतंत्रक जन्म जाइठाम भेलैक, जाइठाम शुक्ल यजुर्वेदक रचना भेल, सामवेदक रचना भेल, गायत्री मंत्रक रचना भेल आ कामशास्त्रक रचना भेल - तकरो बिसरऽमे हमरा लोकनिकेँ कनिञो कचोट नहि भेल । कोशीक उत्पात सहितो तकर व्यथा-कथा लिखबाक चेतना नहि भेल - लिखलनि एक बंगाली विभूति भूषण मुखोपाध्याय । अयाची सन्धाने सेहो हिनके कृतित्व छनि । मणिपद्म चर्च कएने छथि विभूति बाबू आ सतीनाथ भादुरीक, मुदा हुनकोसँ पूर्व पुणेमे अपन घर बना तकर नाम मिथिलारखलनि शरदिन्दु बन्दोपाध्याय । ई मुंगेरमे रहैत छलाह आ अन्तमे स्वामी विवेकानन्द जाहि रामायणकेँ सीताक चरित्रक आदर्श उपाख्यान कहने छथि, तिनको जन्म तँ मिथिलेमे भेल छल । आदिकवि वाल्मीकियोकेँ सीतासँ गप करबाक लेल महापंडित हनुमानसँ मानुसी भाषा बजओने छथि - अवश्यमेव वक्तव्यं मानुसी वाक्यमर्थवत्।आ एही परम्पराक अग्रिम कड़ी छलाह भोला बाबू, भोला लाल दास। ई अपन अस्थि-मज्जाये नहि, सम्पत्तियो बेचि मैथिलीक कल्याणमे लगा देलनि - हमरा लोकनि आइ तिनको मोन रखबाक लेल तैआर नहि । हम एकरा अपन सौभाग्ये बुझैत छी जे एक बेर हुनक दर्शन भेल छल - बाबू साहेब चौधरीक प्रेसमे ।
1964 ई. मे मैट्रिक पास कए कोलकाता आएल रही । बयस थोड़ छल, तेँ प्राइवेटे नोकरीक भरोस । सरकारी नोकरी तँ भेटल 1969 ई. मे । किन्तु मिथिला-मैथिली पहिने भेटि गेल । तहिया कोलकातामे बहुतो मैथिली-सेवी संस्था छलैक । बड़ काज भेल छैक एहिठामसँ । जँ ब्रजमोहन ठाकुरक प्रयास आ आशुतोष बाबूक सदाशयता नहि रहितनि, कीर्त्यानन्द सिंहक आर्थिक सहयोग नहि रहितनि, तँ जानि ने मैथिली कतय रहितथि! कलकत्ता विश्वविद्यालयमे 1919 ई. सँ मैथिली पढ़ाओल जाइछ, बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय 1933 ई. मे किरण जीक प्रयासेँ मैथिलीकेँ मान्यता देलक । विचारणीय थिक जे जँ कलकत्ता विश्वविद्यालय एकरा स्वतंत्र भाषा नहि मानने रहैत तँ साहित्य अकादेमी किंवा संविधानमे स्थान पओनाइ कि सहज छल? स्वभावतः यात्री जी कोलकाताकेँ मिथिलाक लघु संस्करण कहने छथि ।
1969 ई. मे नोकरी भेटल आ कॉलेजमे नाम लिखाओल । कोनो सभामे सुनने रहियैक जे छात्रक अभावमे मैथिली नहि पढ़ाओल जाइत छैक, से मैथिली राखल । एकमात्र विद्यार्थी । आ अनुभव आरम्भ भेल अपन विभूति लोकनिक कृतित्व अनुसन्धान । एही क्रममे भेटला मैथिली दधीचि बाबू भोला लाल दास । किन्तु, ई कोन भोला थिकाह! नान्हिएटामे सिखाओल गेल छल जे ब्रह्मा सृष्टिकर्ता छथि, विष्णु पालनकर्ता आ भोला संहारकर्ता । मुदा हिनकामे तँ तीनू देवक रूप साक्षात!
मोन पड़ैछ किरण जीक श्रद्धांजलि । 1937 ई. मे सरिसवमे मैथिल महासभाक अधिवेशन   रहैक । भोला बाबू मैथिली पोथी प्रकाशनार्थ आर्थिक सहायताक अपील केने छलथिन । बस, आरम्भ भेल हुनक फज्झति । फज्झतिकर्ता लोकनिक नेता छलाह राजपंडित बलदेव मिश्र । जयगोविन्द मिश्र मैथिली पोथी प्रकाशनार्थ मैथिली साहित्य परिषदकेँ एकटा कपड़ा देलथिन । भोला बाबू तकरा महाराजा कामेश्वर सिंहक कर-कमलमे अर्पित कएलनि । महाराजक उदारता मैथिलीक बेरमे विपरीत रूप धारण कएलक । मात्र अढ़ाइ सए भेटलैक परिषदकेँ । जँ बजारेमे बेचल जाइत तँ एकर चारि बड़ अवश्य अबितैक ।
इएह छलाह भोला बाबू! सत्ते ओ भोला छलाह । निर्विकार भावेँ अविरल-अविराम विषपान करैत रहलाह अपन भू-भाषाक अस्मिता-अस्तित्व रक्षार्थ । प्रतिष्ठित हिन्दीक लेखक, ओ हिन्दीयोमे लिखैत रहलाह आ ताइसँ जे पाइक आमद भेलनि तकरा मैथिलीक पोथी छपेबामे लगओलनि । मोन पड़ैत छथि बंगलाक विख्यात रचनाकार शरतचन्द्र - प्रतिष्ठान जते पुरान, जते पवित्र, जते सनातन किएक ने हो, मनुक्खसँ पैघ नहि होइछ ।भोला बाबू सेहो एही मतक माननिहार छलाह । वस्तुतः मनुक्ख आइ धरि जते चीजक आविष्कार कएलक अछि, भाषाक स्थान ताहिमे सबसँ ऊपर छैक । सत्य कही तँ भाषाए ओ चीज थिक जे मनुक्खकेँ मानवता प्रदान करैछ । प्रार्थनासँ साहित्य-सर्जना धरि भाषाएपर निर्भर अछि । यद्यपि भाषा साध्य नहि, साधन थिक, जकरा माध्यमे मिथिला-मैथिलीक कल्याण कएल जा सकैछ। मुदा अपसोच जे बादक नेतालोकनि एहि बातकेँ सहजतासँ बिसरा देलनि । परिणाम समक्षे अछि । वस्तुतः इतिहासक पन्ना जँ उनटा कए देखल जाए तँ ई बात स्पष्ट भऽ जायत जे प्रत्येक महान पुरुष अपन जीवन कालमे समसामयिक एक वर्ग द्वारा आलोचित-अपमानित होइत रहलए; मुदा संगहि, ठीक एकर समानान्तर एक आओर वर्ग द्वारा पूजित-सम्मानित सेहो । उल्लेखनीय जे 1937 ई. मे भारतीनामक पत्र प्रकाशित करय लगलाह तँ सम्पादन करबाक लेल भुवन जीकेँ अनुरोध कएल । भुवन जी जखन नहिं गछलथिन, तँ अपने ओ काज कएलनि । किन्तु विडम्बना देखू जे पीठेपर भुवन जी विभूतिबहार कएलनि, जकर  पहिले अंकमे लिखलनि, ‘मैथिली साहित्य परिषदकायथक संस्था थिक आ भारतीथिक कैथिन । किन्तु भोला बाबूक व्यक्तित्व आ कृतित्वसँ परिचित लोक सभ हिनका मैथिली दधीचिक सम्मान देलक ।
मोन पड़ैत अछि भोला बाबूक अनमोल अवदानक कथा । जँ भोला बाबू नहि रहितथि तँ की पटना विश्वविद्यालय मैथिलीकेँ मान्यता देने रहैत? पाइ के देलथिन, ताइसँ महत्त्वपूर्ण थिक जे प्रयास के केलनि । भोला बाबू प्रत्येक अभावक पूर्त्ति लेल सतत तत्पर रहैत छलाह । मैथिली पढ़ाइ आरम्भ भऽ गेल मुदा पोथी नहि अछि । भोला बाबू अनति विलम्ब तकर पूर्त्ति कऽ दैत छलाह । ओ कतेक लिखलनि, कोन-कोन भाषामे लिखलनि, तकर आइयो निस्तुकी नहि भऽ सकल अछि । कमलेश झा कहियो कोलकातामे रहैत छलाह, आइ दरभंगा धयने छथि; हिनक दृष्टिमे ई सभ बात रहैत छनि । भोलालाल दास रचनावलीक प्रथम खण्ड ई प्रकाशित कएलनि 2008 ई.मे । लोकार्पण लेल हम कोलकातासँ गेल छलहुँ । विद्वानलोकनिक जे विचार सुनल, अपनो ओतेक नहिं जानल छल । अपन पयस्विनीमे सुमन जी लिखैत छथि–
जनिका नहि परबाहि आहि क्यो कहओ बताहो ।
मैथिलीक हित  लड़बे उचित   पहिरि सन्नाहो ।।
जे विधान-विद्वान, सुकविसम्पादक, वक्ता ।
उभय भारती-मिथिला-हित नित जे अधिवक्ता ।।
          दासमैथिलिक लालछथि जे अमोल भोला भला ।
माथ मातृभाषाक नहि झुकओ, कटओ बरु निज गला ।।’  
भोला बाबू अपने लिखैत छथि - केवल सुमने जी नहिं, प्रकारान्तरे मैथिली स्वीकृति-संघर्षक सफल सेनानी (वस्तुतः एक साधारण सेवक) रूपेँ स्व0 डॉ. उमेश मिश्र, राय बहादुर जयानन्द कुमर, ठाकुर सूर्य नारायण सिंह, पं. गिरीन्द्र मोहन मिश्र, स्व. कुमार गंगानन्द सिंह, प्रो. हरिमोहन झा, श्री अमर जी आदि अनेकानेक व्यक्ति एहि प्रकारक भाव हमरा वा परिषदक विषयमे व्यक्त कऽ चुकल छथि । कतेक गोटाकेँ मना कएल जाइत । एहि विषयक हम चर्चो नहिं करितहुँ, कारण ई आत्मप्रशंसे थिक, मुदा मैथिल समाजमे एहनो एक गुट भेल अछि जे डॉ. सुधाकर झा शास्त्रीकेँ अपना संस्मरण वार्तामे हमरा नामक तँ कथे नहि, ‘मैथिली साहित्य परिषदक ओहि विमल यशक चर्चो मात्र नहि करए देलकनि । परिषद रूपी पूर्ण चन्द्रक एहि राहुगणहिक अनुरोधे ई धर्म-संकट लिखल गेल ।
भोला बाबूक मादे लिखय बैसल छी । किछु प्रश्न छैक जे की लिखी आ की नहिं लिखी । जँ हिनक व्यक्तित्व आ कृतित्वक मादे सांगोपांग लिखी तँ एक महाभारते भऽ जायत । ओनहुना हिनक समस्त कृतित्वक ज्ञानो नहिञे अछि । ई एक नामी ओकिल छलाह, यशस्वी लेखक छलाह, आदरणीय सम्पादक छलाह । कथा-कविता-निबन्ध, पाठ्य-पुस्तक - सभ लिखैत छलाह । नीक आयोजक छलाह । विद्यापति जयन्ती हिनके आरम्भ कएल थिक । मुदा जँ एक वाक्यमे कही तँ ई खाँटी मैथिल छलाह । मैथिलीक प्रति हिनक अनुराग तँ छलहे, मिथिलाक्षरोक प्रति कनिञो थोड़ नहि । एकठाम ई लिखैत छथि - भारतवर्षहुमे एक लिपिक आन्दोलन होइत-होइत अनेकानेक अस्थिरो लिपि स्थिर भऽ गेल, केवल एकटा मैथिलिए लिपि एहन रहि गेल जे मैथिल जातिक उदासीनतासँ अपना अन्तिम घड़ीक प्रतीक्षा कऽ रहल अछि । परिषदक ओ मिथिलाक्षरांकन समितिक ई प्रधान कर्तव्य अछि जे एकरा स्वीकृतिक हेतु बद्धपरिकर भऽ जाए किन्तु एहि आयासमे सफलता तखनहि हएत जखन श्रीमान् मिथिलेशो मैथिलीक नेतृत्व ग्रहण करथि । की मिथिलाक्षरक प्रेमी राजपंडित श्रीयुत बलदेव मिश्रजी आदि महानुभाव एहि दिसि किछु ध्यान देताह?’ 
ध्यान देबाक बात थिक जे बलदेव मिश्र हिनक जे फज्झति केने छलथिन, से हम पहिनहि लिखि चुकल छी, किन्तु तिनको प्रति हिनक कथन कते संयमित छनि! ज्ञात भेल अछि जे मैथिलीक वरिष्ठ कवि-साहित्यकार गंगेश गुंजन मिथिलाक्षरक विरुद्ध आ देवाक्षरक पक्षमे अपन मत प्रकाशित केलनिहें । एकरा विडम्बना नहि तँ आर की कहल जायत? कहियो पण्डित गोविन्द झा कहने छला जे जय-जय भैरवि....विद्यापतिक रचना नहिं छनि ।वस्तुतः मैथिलीक विरोध मैथिले द्वारा वर्तमानमे संक्रामक रोगक रूप लेने जा रहल अछि । हिन्दी पटरानी थिक, मेवाक आसमे तकर सेवा कएनिहारक अभाव नहि, अपन मैथिली रचनाकेँ हिन्दी अनुवाद कए प्रकाशित करओनाइ फेसन भऽ गेल अछि, मुदा जननी जन्मभूमिच स्वर्गादपि गरीयसीकेँ केना बिसरल जायत? ई की मनुष्यता होयत? भोला बाबूकेँ एकर बोध छलनि । तेँ ओ माँ बदलि डाइनक पूजार्चनाक विरोधी छला । मिथिलाक्षरक प्रचारोपायजे प्रथम खण्डक पृष्ठ 49 पर देल गेल अछि, से देखि कोनो मैथिली-प्रेमीक सूप सन छाती भऽ जेतनि - ई विश्वास हमरा अछि । धन्यवादक पात्र छथि कमलेश जी । मोन पड़ैत अछि मधुप जीक श्रद्धांजलि - 
दिवंगत मिथिलाक भोला पूज्य भोलालाल दासक संस्मरणमे निरन्तर
नदनदी निर्माणक युगल-निज-नयन-नीरद-नीर निकरक विन्दुनिर्मित हार
निसर्गोद्भव भवक वैभव-भक्ति-मण्डल-मण्डित
मानस मधुप मम समर्पित करइत मङै अछि –
फेर ओहने आबि भोला अपन भोलापन देखबिते,
भेद-भावक दुर्गकेँ ओहिना ढहबिते,
अबुधवान्धववर्गकेँ गंगा नहबिते हमर भाषाकेँ चराँते बुझनिहारहुँकेँ सिहबिते,
राजनीतिक पाँकमे फाँसल हुनक रक्षित अपन भाषाक शकटी केर करथि उद्धार ।
जाहिठाम सुमन जी, मधुप जीक एहन विलक्षण भावना, ताहिठाम आनक बाते की हो!   भोला बाबूक आर एक पोथी हमरा प्राप्त भेल अछि, ओ थिक बाबू भोलालाल दास  रचनावलीक दोसर खण्ड । एकरो सम्पादक छथि, फूलचन्द्र झा प्रवीण । अर्थ सहयोग छनि शारदानन्द दास परिमलकेर । एहि खण्डमे मैथिली सुबोध व्याकरणमैथिली व्याकरण प्रबोधअछि । भोला बाबूक तप-साधनाकेँ मोन पाड़ैत यादि अबैत छथि यासेर अराफात -
‘You ‍are‍ the ‍generation ‍that‍ will
reach the sea and hoist the flag
of‍ Palestine ‍over‍ Tel‍ Aviv.’
रवीन्द्र ठाकुर कहैत छथि –
नागिनीरा चारिदिके फेलितेछे विषाक्त निःश्वास
शान्तिर ललित वाणी सोनाइबे व्यर्थ परिहास,
          विदाइ नेवार आगे
ताइ डाक दिये जाइ
दानबेर साथे संग्रामेर तरे
प्रस्तुत हतेछे जारा प्रति घरे-घरे।’
बंगलाक विख्यात कवि विष्णु देक शब्दमे –
तोमार ओ दीप्ति मुक्ति पाबेइ आमार चित्ते
कोनो तरुण तमाले,
एक दिन, एक राते कोनो एक काले।
जानि नहि से दिन, से राति, से काल मिथिलामे कहिया आओत! किन्तु भोला बाबूक ई कामना-भावना अवश्ये छलनि आ ताहि लेल ओ सतत संघर्ष करैत रहलाह । किन्तु मिथिला- मैथिलीक जे वर्तमान अवस्था देखि रहल छी, ताहिमे तँ ई बात सोचलो नहिं जा सकैत अछि । मैथिलीक सम्मान परदेशेमे भेटलैक आ आइयो ई परदेशेपर निर्भर अछि, खाहे कोलकाता हो वा हैदराबाद-सिकन्दराबाद । भनहिं पुरस्कार सबटा दरभंगा-मधुबनीए धरि सीमित हो । मैथिलीक अधिकांश साहित्यकार मगह-दिल्ली धेने छथि । बहुतोक घरक भाषा हिन्दी अछि । आइ ने तँ भोला बाबू छथि, आ ने मैथिली आ हिन्दीलिखनिहार जनकवि यात्री जी । तखन तँ अपन श्रद्धांजलिए टा दऽ सकैत छियनि एहि संकल्पक संग जे आजीवन मैथिली लिखैत रहब, बजैत रहब ।
 भोला तँ भोले छलाह, कतबा कही कमाल।
एक शब्दमे जँ कहीमैथिलीक  ओ लाल ।।
मैथिलीक ओ लाल, भाल-भूषण मिथिला के ।
बाधा-विघ्नक काल, कएल जीवन्त शिला के ।।
कह लोचन कविराय, दधीचि बनल बंभोला ।
मैथिलीक बनि दास, पूज्य मैथिल हित भोला ।।

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साभार संदर्भ
देसिल बयना  (मिथिला विभूतिपर्व स्मारिका)
[पृष्ठ सं. : 21-24]
मई’ 2017
संपादक : चन्द्रमोहन कर्ण
प्रकाशक : देसिल बयना , मैथिली साहित्य मंच
118-एच.आइ, जी, मदीनागुडा, पो. मियाँपुर, हैदराबाद- 500049


[*हैदराबादक मैथिली साहित्यकेँ समर्पित संस्था देसिल बयना वर्ष भरिमे दू गोट विशेष कार्यक्रमक आयोजन करैत अछि - नवम्बर मे विद्यापति स्मृति समारोह आ मई मे मिथिला विभूति पर्वक । एहि दुनू अवसर पर स्मारिकाक प्रकाशन सेहो कयल जाइत छैक । देसिल बयना स्मारिकाक लोकप्रियता दिनानुदिन बढ़लै ये । सामग्रीक प्रचूरता वला एहि स्मारिका मे विभिन्न विधा आ विभिन्न स्तरक रचनाक समावेश रहैत छैक । एहिमे कतेको रचना उल्लेखनीय होइछ । एकर श्रेय संपादक चन्द्रमोहन कर्ण जीकेँ छन्हि जे सामग्री संयोजनसँ ल के टाइपिंग आ प्रूफ रीडिंग तकक काज असगरे गंभीर दायित्वबोधक संग करैत छथि । देसिल बयना औपचारिक रूपें स्मारिका होइतो अपन चरित्रमे मैथिलीक छौमाही साहित्यिक पत्रिका जेना अछि । 
एहि संस्थाक मई’ 2017क मिथिला विभूति पर्वक आयोजन बाबू भोलालाल दास आ धूमकेतु पर केन्द्रित छलहि ।  स्वभाविकरूपें एहि अवसर पर प्रकाशित स्मारिकामे हिनका दुनू गोटय पर केन्द्रित बहुत रास सामग्री प्रकाशित भेल अछि । ओहिमे से किछु सामग्री मैथिली मंडन पर उपलब्ध करेबाक प्रयास रहत ।]