Sunday 1 March 2009

कृतघ्न मनुख बेमार आलोचना.

मैथिली साहित्यक समृद्धि कें स्वीकारबा में प्राय: एकरा सं परिचित आनो भाषा-भाषी कं असोकर्ज नहि बुझैत छैन्हि. मुदा जे गप विचारवाक अछि से थिक साहित्यिक समृद्धिक पाछू किनका सबहक खपि जेनाय रहल छैन्हि.
नाम गिनेबा लेल जं भिडि जाइ त' असमाप्य श्रृंखला शुरू भ' जायत.
मुदा कृतघ्नता में हमर सबहक जोर नहि. भाषा संस्कृतिक नाम पर भरि जीवनक होम क' देनिहार कें हम सब बेर-बेर मोन तक पारब उचित नहि बुझैत छी. जीबैत काल धरि किछु गोष्ठीक अध्यक्षता आ छोट छिन सम्मानक अलावे हुनका सबहक हिस्सा किछु नहि अबैत छैन्हि. अहि दुर्भाग्य पूर्ण प्रसंग सं अपना सबहक सौन्दर्यबोध आ संस्कृतिबोधक इयत्ता संदेहक वस्तु
बनि गेल अछि. अतीतक तीत अनुभव नवतुरिया सबकें सहज नहि होमय द' रहल छैक. अहि सन्दर्भ में युवा रचनाकार अखिल आनंदक ई गप उल्लेख करबा योग्य अछि – “ मैथिली सं पाइक आस तं नहिये रहैत छैक कम सं कम सही मूल्यांकन त' होए’’. गुणगान आ निंदाक बीच फंसि दम तोइर रहल मैथिली आलोचनाक सधल इलाज़ बहुत जरूरी छैक .

1 प्रतिक्रिया भेटल:

  1. maithili alochnak pramukh samasya samarpan aa nishtha bhav ker kamee thik. tatka peerhi san ummed kari hamra sab(?)!!

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