Monday, October 11, 2010

भवनाथ झा केर एक गोट लघुकथा


भवनाथ, मैथिली मंडन लेल फेसबुक परक उपलब्धि छथि । उर्जस्विता आ मैथिलीक प्रति निष्ठा हिनक इन्टरनेट जगत मे मैथिलीक सन्दर्भ मे सक्रियता सँ प्रदर्शित होइत छन्हि । हिनक लघुकथा- 'आशुकवि' अपन मूल मे व्यंग्य प्रधान अछि जे सुक्ष्म रुपें साहित्य केर सामाजिक सरोकार कें साहित्यकारक व्यक्ति केर तौर पर दायित्वबोधक बिना अपूर्ण मानैत अछि । कामना जे भवनाथ मैथिली साहित्य जगत मे सतत रचनाशील रहथि आ सामजिक दायित्व केर निर्वाह करैत अन्य रचनाकार लेल एकटा आदर्श प्रस्तुत करथि ।



आशुकवि
पटना सँ गाम जएबा ले बस पकड़ने रही तँ वर्षाक कोनो संभावना नहि रहैक। मुदा गाँधीसेतु पार करितहिं रुद्रदेव साकार भए गेलाह । आगाँ तेहन हुनक ताण्डव भेल जे बस के रोकि देबए पड़लैक । रातुक एगारह बाजि रहल छल । अन्हार राति...झाँट, बिहाड़ि, बिजुलोका, मेघक अट्टहास...। मुदा फेर सभटा शान्त भेलैक । बस चलल। आगाँ सड़क पर गाछ सभ खसल रहैक । बहुत ठाम तँ बस निकलि गेलैक मुदा एक ठाम एकटा पैघ गाछ खसि पड़ल रहैक । बस रुकल आ भीतरक इजोत बारि देल गेलैक । कंडक्टर जा क' देखलक आ आबि क' कहलकै जे अहूँ सभ जँ संग दी तँ गाछ के हटाओल जा सकै छै, नै तँ भिनसर भेला पर कोनो उपाय हेतै । सभ यात्री एक स्वर सँ आश्वासन देलखिन आ सीट छोड़ि बहराए गेलाह आ जिनका जतहि गर लगलनि जोर लगा देलनि । तखनि की छल! थोड़बे काल मे गाछ घिसिया के कात कए देल गेल । हम सभ जखनि घुरि क' बसमे अएलहुँ तँ एकटा युवक निश्चिन्त भेल किछु लिखि रहल छलाह । हुनका पुछलियनि तँ ओ उत्तर देलनि -" हम तँ बैसले रही । मुदा भाई! आई अहाँ सभक जे एकता हम देखलहुँ तँ ततेक नीक लागल जे हमरा रहल नहिं गेल। एकटा कविता लिखए लगलहुँ । सुना दैत छी ।" हम अवाक रहि गेलहुँ । ताबत बस चलि पड़ल आ हुनक कविता बसक घड़घड़ीमे बिला गेलनि ।