Showing posts with label मैथिली आंदोलन. Show all posts
Showing posts with label मैथिली आंदोलन. Show all posts

Friday, September 12, 2025

लोक-शिक्षा मे मैथिलीक स्थान : बाबू भोलालाल दास

संदर्भ पोथी ‘मैथिलीक दधीचि : बाबू भोला लाल दास’ मे लेखक श्री शम्भुनाथ मिश्र सूचना देनय छथि जे पटोरी (भागलपुर) मे मैथिली पुस्तकालयक उद्घाटनक अवसर पर बाबू भोलालाल दास द्वारा देल गेल वक्तव्यक एहि लेख केर रूप मे 'मिथिला मिहिर'क अप्रैल 1944 अंक मे प्रकाशन भेल छल। बाबू भोलालाल दास दृष्टिसंपन्न अभियानी छलाह। हुनकर चिंतन आ विचार हमरा सबहक लेल अत्यंत महत्वपूर्ण अछि। एहि लेख मे व्यक्त हुनकर शिक्षा आ भाषा संबंधी विचार समृद्ध करैत अछि। एहि मे मातृभाषा मे शिक्षाक विषय मे भारतीय इतिहासक अनेक एहेन प्रसंगक उल्लेख अछि जे कम लोक केँ नहि बूझल हेतन्हि। मिथिला मे मातृभाषा मे शिक्षाक प्रश्‍न एखनहु लंबित अछि। ई लेख एहि प्रसंग मे प्रेरित करैत अछि। एहि मे संदर्भ पुस्तकक वर्त्तनी आ देवनागरी अंक केँ प्रायः यथावत राखबाक प्रयास कएल गेल अछि।

लोक-शिक्षा मे मैथिलीक स्थान

बाबू भोलालाल दास

एकटा बड़ महत्त्वपूर्ण प्रश्‍न ई उठैत अछि जे जनताक शिक्षा की बिना मातृभाषाक माध्यमे भए सकैछ? देशक प्रत्येक महान व्यक्ति के ई प्रश्‍न किछु दिन पूर्वहि सँ आह्वान करत आयल छैन्हि। कारण जे कतबो व्यापक, साध्य एवं उपयोगी अङ्गरेजी भाषा रहओ ओ एहि देशक हेतु सार्वजनिक भाषा नहि भए सकैछ। प्रत्येक विद्वान आओर राष्ट्र-कर्मी एहि सिद्धान्त के स्वीकार करबा मे सम्मत छथि। आनो दृष्टि मे वर्तमान शिक्षापद्धतिक एक योजना गेल अछि। किछु वर्ष पूर्वहि तएँ हेतु महात्मा गांधी प्रभृति देशक प्रधान नेतागण भावी शिक्षा पद्धतिक एक योजना तैयार कएलैन्हि जे सम्प्रति 'वर्धा स्कीमक, नामे प्रख्यात अछि। यहि योजनाक ध्येय छैक जनताक अनिवार्य शिक्षा। अंग्रेजो सरकार १५०-२०० वर्षक अभ्यन्तर १०-१२ प्रतिशत से अधिक लोक के शिक्षित नहि कए सकल तएँ अनिवार्य शिक्षाक अनिवार्यता। अस्तु, अन्यान्य विषयक समावेश करत वर्धा पद्धति ७म कक्षा पर्य्यन्त मातृ-भाषाक द्वारा शिक्षा देवाक विधान कएलक अछि। यावत् प्रत्येक कांग्रेस प्रान्त मे शिक्षा सुधारक हेतु प्रान्तीय कमिटी बनाए आ सबके मिलाए एक अखिल भारतीय कमिटीक निर्माण हो वा ई सब अपन-अपन मन्तव्य प्रकाशित करथि तावत् कांग्रेस मन्त्रि-मंडल सब ठाम सँ टूटि गेल किन्तु सरकार द्वारा प्रायः तकर कार्यक्रम कतहु नहि रोकल छैक। उप-स्थित विषय केँ बुझबाक हेतु एतबा कहि प्रकृत विषय पर अबैत छी। बिहारे प्रान्त मुदा बड़ विचित्र अछि। कहियो बुद्ध छलहुँ मुदा एखन तँ बुद्धुए बुझल जाए रहल छी। अन्यथा डिक्री तैयार हएबाक पूर्व कोन एहन प्रान्त अछि जतए इजरायक क्रिया कार्यगत हो ? एतय शिक्षा सुधार कमिटीक व्यवस्थो तावत् नहि प्रकाशित भेल कि हिन्दुस्तानी कमिटीक निर्माण भए गेल ओ तकरा तेसर कक्षा घरि प्रत्येक विषयक एवं ताहि सँ ऊपर नवम कक्षा पर्य्यन्त असाहित्यिक (Non-language) विषयक हिन्दुस्तानी पुस्तक निर्मित करएबाक ओ स्वीकृत करबाक अधिकार दए देल गेलेक। एकर की परिणाम भेल अछि वा होयत से शिक्षक वा शिक्षिते वर्ग कहताह मुदा ई विषय कोनहु रूपे उपेक्ष्य नहि अछि।

आब कनेक शिक्षा-निर्माण-कमिटीक व्यवस्थो सुनि लिय। १७ मार्च १९३६क पूर्णाधिवेशन मे (जाहि मे स्वयं डा० राजेन्द्र प्रसाद जी उपस्थित छलाह) सर्व सम्मति सँ ई स्वीकृत भेल जे सातम कक्षा पर्य्यन्त मैथिली भाषी नेनाक शिक्षा मैथिली द्वारा हो किन्तु कोनो विचित्र गतिए १९४० मे एहि निर्णय के उनटि देल गेल। किमविधिकम्, डा० राजेन्द्र प्रसाद जी ताहि उलट-फेर मे सहमत भए गेलाह ! कमिटी मे एक मात्र प्रो० अमर नाथ झा जी मैथिली बजनिहार छलाह अतः ओ एहि उलट-फेर सँ सहमत नहि भेलथिन्ह। हुनका एहि विषय पर अपन विरोध सूचक व्यवस्था देबाक अधिकार देल गेलेन्हि। फलतः हुनक अखण्डनीय नोट ओहि मे लागल अछि, जाहिसें मैथिलीक योग्यता, अधिकार ओ अनिवार्यता संगहि ओकरा प्रति कएल गेल अनर्गल अत्याचार प्रत्यक्ष अछि।

उक्त कमिटी अनिवार्य शिक्षाक जे योजना एहि रिपोर्टक द्वारा उपस्थित कएने छेक से व्ययसाध्य छैक। तावत् विश्‍वव्यापी युद्ध भारतक द्वारदेशमे आवि तुलाएल। सेक्रटेरियटक कोनहु कोनमे ई रिपोर्ट सड़ि रहल अछि। सरकार एकरा मंजूर करओ कोना ? मुदा तएँ की ? निर्णय (जजमेंट) हो वा नहि, जयपत्र (डिक्री) प्रस्तुत कएल जाओ वा नहि, हिन्दुस्तानी कमिटी कार्यकारिणी न्यायशालाक काज कइए रहल अछि। ओ संस्था ने केवल मैथिलीक अपितु हिन्दी पर्य्यन्तक हत्या भोथ छुरी सँ कए रहल अछि। सरकारकेँ एहि सभक कोन प्रयोजन छन्हि, ई तँ प्रत्येक बिहारवासोक गंभीर चिन्ताक विषय थीक।

हम हिन्दीक कोन कथा हिन्दुस्तानी पर्य्यन्तक विरोधी नहि छी। किछु दिन पूर्व जखन प्रान्तीय विश्‍वविद्यालय द्वारा मैथिलीक स्वीकृतिक हेतु यत्नवान छलहुँ तँ एहि प्रकारक मिथ्या धारणा हमरा विषयमे कतोक गोटाकै छलेन्हि मुदा ताहि युगक आब प्रायः अवसान भए गेल छैक। वर्धा स्कीममे मातृभाषा ओ राष्ट्र-भाषाक स्थान निर्धारित भय गेने एहि भ्रमक भाव समावेशो नहि छैक किन्तु शिक्षा बिभागक अधिकारी-वर्गकै एखनहुँ मातृभाषाक ई अधिकार भयावह, अमंगलसूचक एवं अप्रयोजक बूझि पड़ैत छैन्हि। हुनका भ्रम छैन्हि जे मैथिलीक स्वीकृति देने भोजपुरी ओ मगही सेहो ठाढ़ होयत एवं बिहार प्रांतमे भाषाक अनैक्य होयत। ई संदेह यथार्थ पूछी तँ आनो प्रांतक हेतु उपयुक्त छैक, कारण जे कतोक प्रांत मे दू-दू तीन-तीन मातृ‌भाषाक व्यवहार छैक। महात्मा गांधी आदि वर्द्धा योजनाक सूत्रधार गण एहि शंका सँ अनभिज्ञ नहि छलाह, तथापि मातृभाषाक विना जनशिक्षाक कल्पना असम्भव देखि ओ सब मातृभाषा तथा राष्ट्रभाषाक पारस्परिक स्थान निर्देश कए देलथिन्ह। खरे महाशयक सभापतित्वमे जखन दिल्ली मध्य अखिल भारतीय शिक्षा सुधार कमिटीक अधिवेशन भेल तँ एहि कठिनताकें दृष्टिमे राखि ई निर्णय भेलैक जे मातृभाषाक अर्थ प्रत्येक बोली नहि प्रत्युत वैह बोली थीक जकरा किछु साहित्य छैक। ओ लिखैत छथि – ‘The Wardha scheme lays down that the medium of instruction shall be the mothertongue, that is the vernacular of the pupil. The Abbot-wood Report makes the same recommendation and few will be found to disagree. The committee unanimously approve, though they are aware that in certain provinces a difficulty might arise as more than one vernacular may be spoken, In making this recommendation the Committee will emphasise that the term "vernacular" connotes the literary language and not a dialect.

आब विचारवाक बात अछि जे बिहार मे मैथिलीक अतिरिक्त कोन भाषा साहित्यिक अछि। डा० श्री अमरनाथ झा उक्त उद्धरण दैत अपना विरोध सूचक नोटमे लिखेत छथि। “Magahi and Bhojpure are not literary language and they are ruled out” कहए नहि पड़त जे बिहार में केवल मात्र मैथिली साहित्यिक मातृभाषा अछि, सुतरां उपर्युक्त शंकाक स्थान नहि छैक। तथापि छोट-छोट दुधमुहाँ नेना सभक हेतु मातृभाषाक स्थानमे हिन्दुस्तानी शिक्षाक माध्यम राखल गेल अछि! हिन्द यावत् छलैक तावत् बात एक तरहक छलैक कारण जे हिन्दीक संस्कृत सँ अधिक सम्बन्ध छैक किन्तु हिन्दुस्तानी तँ ताहू सँ दूर पड़ि जाइत छैक। कोनो उच्च कक्षे मध्य उपयुक्त भए सकैछ, जखन विद्यार्थी के देश-विदेशक बहुत किछु ज्ञान भए जाइ छैन्हि किन्तु विचित्रता तँ ई अछि जे कमिटी मातृभाषाक सिद्धातकें सर्वतोभावेन, स्वीकार करैत ई निर्णय देने अछि ! क्रिमाश्‍चर्य्यगतः परम् ? कमिटी अपना रिपोर्टक धारा ११० मे लिखैत अछि जे - During this period of 7 years Basic Education, the question of the medium of instruction need not cause us any great difficulty. It is an accepted principle of proper education that knowledge should be imparted through the medium of the mother-tongue. We indorse it completely and we would admit of few exceptions.

एवं मातृभाषाक द्वारा ७ वर्ष पर्य्यन्त शिक्षा देवाक सिद्धान्तकें पूर्ण रूपें स्वीकृत करैत बिहारक ई भाग्यविधाता लोकनि हिन्दुस्तानीए शिक्षाक माध्यम स्वीकृत कएलेन्हि अछि। एकर अर्थ ई मेल जे हिन्दी वा हिन्दुस्तानी हमर मातृभाषाक थीक। डा० सच्चिदानन्द सिंह अपना नोटमे स्पष्ट लिखने छथि जे 'हिन्दी बिहारक मातृभाषा नहि। ई एक पश्चिमी भाषा थीक जकरा हम राजनैतिक कारणे किछु काजक हेतु अपनौने छी।’ वस्तुतः हिन्दी वा हिन्दुस्तानी के बिहार राष्ट्र-माषा मानि सकैछ, मातृभाषा कोना मानत? आओर यदि कोनो भविष्यमे जन-साधारणक अनिवार्य शिक्षाक योजना हेतेक तँ बिना मैथिलीकें वर्धा स्कीमक स्थान देने कोनोटा उपाय नहि छैक। आइ ने काल्हि ओहो दिन अएवे करतेक।

सरकारी शिक्षा विभागक ई नीति किछु दिन आओर रहतैक मुदा हमरा सभक दृष्टि दूरदर्शी होमक चाही। कोनो प्रकारक गैर सरकारी शिक्षा प्रचारक उद्योगमे हम सब मातृभाषा ओ राष्ट्रभाषाक स्थान मे विपर्यय नहि आबे द, ई हमर अनिवार्य्य कर्त्तव्य होमक चाही। संख्या, एकर प्राचीन साहित्यक उत्कर्ष, एकर नैसर्गिक शक्ति, एकर दूरदेशी प्रभाव आदि सब किछु आश्‍चर्यजनक अछि। नेपाल, बंगाल, उड़िसा ओ आसाम पर एखनहुँ एकर पर्याप्त प्रभाव छैक। तखन की ई अपना घरहिमे विस्मृत, आनादृत ओ त्यक्त रहत ? हमरा जनैत एकरा द्वारा समाजक ओ सब अंग, जकरा शिक्षाक नितान्त आवश्यकता छैक आओर जकर चर्चा हम पूर्वमे कए चुकल छी, जाहि द्रुत गतिय शिक्षित भए सकत ततवा आन कोनो भाषाक द्वारा नहि। तएँ हेतु हम अपने सबहुँ सँ मैथिली ग्रन्थ संग्रहक विशेष अनुरोध करब। अपना देहातमे एखनहुँ लोरिक, दयालसिंह, सोठि कुमरि, नौका, बिहुला, सलहेस आदिक शतावधि ग्राम्य गीतक प्रचार अछि किन्तु ओ लुप्त भैल जाइछ। मरसिया अर्थात् दाहा मे मैथिलो गीतक प्रचार अछि। एहि सबकें लिपिबद्ध कए लेब एकान्त आवश्यक अछि।

हमरा बुझने बड़ शुभलक्षण थीक जे आब हिन्दीक अभिभावक लोकनिमे विकेन्द्री करणक भावना प्रबल वेगें जागृत भए रहल छैन्हि। आब ओ सब बूझि रहलाह अछि जे वस्तुतः प्रान्तीय मातृभाषाकें दबौने हिन्दीक उन्नति नहि भय सकैछ आओर ने हिन्दी-उर्दू क प्रतिद्वन्द्विते हँटत। आब केवल प्रयागके हिन्दीक कार्य्य क्षेत्र नहि मानि प्रांत-प्रांतमे मातृभाषाक आभिवृद्धि द्वारा राष्ट्र ओ राष्ट्रभाषाक मंगलमय भविष्य निर्मित भए रहल अछि। जहिना सोवियत रूस आइ अपना सोलहो प्रान्तकें पूर्ण स्वाधीनता दए देनेँ अछि, तहिना प्रत्येक प्रान्तीय मातृभाषाकें हिन्दीक -चूड़ान्त अभिभावकगण पूर्ण स्वतन्त्रता देबाक पक्षमे सन्नद्ध भए उठत्ल छथि। गत हरिद्वारक अखिल भारतीय हि० सा० सम्मेलन द्वारा बहुमतसँ विकेन्द्रीकरणक प्रस्ताव स्वीकृत भए गेल अछि। विशाल-भारतक भू०पू० सम्पादक पं० बनारसीदास चतुर्वेदी अपना प्रान्त बुन्देल खंडमे बुन्देली भाषाक उत्थानक हेतु प्रबल आन्दोलन ठाढ़ कए देने छथि। द्रुत गतिसँ बुन्देलीमे नवीन साहित्यक निर्माण भय रहल अछि, पुस्तक ओ पत्र-पत्रिकाक प्रकाशन बढ़ि रहल अछि। सर रात्धाकृष्ण सम्मुखम् चेट्टी अन्नामलय विश्‍वविद्यालयक दीक्षान्त भाषणमे गतवर्ष कहने छथि जे –

Of late there has been a revival of interest in the study of vernacular languages and there is a spirit of renaissance in the different cultures of India. I am not one of those who look upon this as a fissiparous tendency threatening the unity of India. Infact I consider that those who oppose this spirit are the enemies of Indian nationalism, for, they forget that Indian culture and nationalism are the Synthesis of different cultures and multi-national forces each with great traditions and a strong individuality.

-Searchlight 8.12.43.

अर्थात् - किछु दिनसँ प्रान्तीय मातृभाषाक अध्ययनमे जागृति उत्पन्न भेल अछि ओ भारतवर्षक भिन्न-भिन्न केन्द्रमे नव जीवनक संचार देखि पड़ैछ। हम ओहि व्यक्ति मे सँ नहि छी ने एहि भावनाकें भारतीय एकताक बाधक बुझे छथि। हम तँ वास्तवमे ओहि व्यक्तिकें भारतीय जातीयताक शत्रु बुझै छियन्हि जे एहि भावनाक विरोध करै छथि जाहि हेतु जे ओ व्यक्ति एहि बातकें बिसरि जाइ छथि जे भारतीय संस्कृति ओ जातीयता भिन्न-भिन्न संस्कृति ओ जातीयताक सामंजस्य थीक जकरा अपन-अपन विशेष परम्परा एवं सबल व्यक्तित्व छैक।

मैथिलीक क्षेत्रमे एहि बीच जे किछु कार्य्य भेल अछि तकर प्रतीक्षा दूर-दूरसँ कएल जाए रहल अछि। बुन्देलखंडक कार्य्यकर्तागण हमरा कार्य्यवाही के विशेष सतृष्ण दृष्टियें देखि रहल छथि ओ भिन्न-भिन्न मार्गें तकर सूचनो लए रहल छथि। एहना स्थितिमे हम सब की उदस्त भेल केवल सरकारी भिक्षाक मुखापेक्षी रहब?

भारतवर्ष - इङ्गलैंड, जर्मनी, फ्रांस, जापान आदिक समान कोनो छोट देश नहि। एहि सब देशक विस्तार एकर प्रान्त सबमे छैक। एकर तुलना चीन, रूस अथवा अमेरिकाक युनाइटेड स्टेटसँ भए सकैछ। एहि सब पैघ देश मध्य कतोक विस्तृत प्रदेश वा प्रान्त छैक जकरा पूर्ण रूपें स्थानीय स्वतंत्रता छैक। हँ, सब प्रान्तक कोनो एकेटा केन्द्र-शासन छैक। नेहरू-रिपोर्टमे भारतवर्षहुक हेतु तेहने विधान स्वीकृत भेल छलैक। जिन्ना साहेबक दुराग्रहें आइ किछु मुसलमान भाइ भने एकरा दू जातिक देश कहथु किन्तु विभागक आधार जाति सम्बन्धी नहि प्रान्त सम्बन्धी श्रेयस्कर भए सकैछ। तएँ चेट्टी महोदयक उपर्युक्त विचार अराष्ट्रीय हएबाक तँ कथे नहि शुद्ध रूपें राष्ट्रीय ओ जातीय भावनोद्भुत अछि।

समस्त राष्ट्रक कोनो एकटा भाषा होएब अनिवार्य्य ! उर्दू-मिश्रित हिन्दुस्तानी से राष्ट्रभाषा भय सकैछ मुसलमान सब देवनागरी लिपि अंगीकृत कय लेथि। किन्तु यावत् लिपिक झगड़ा रहत तावत् राष्ट्र भाषाक प्रश्‍न हल नहि भए सकत। मुदा हिन्दी, उर्दू अथवा हिन्दुस्तानी जे कोनो राष्ट्रभाषा हो से होऔ किन्तु से भाषा एतेकटा देशमे सब प्रान्तक मातृभाषो भए जाएत, से कोना संभव? हमरा हिन्दी वा हिन्दुस्तानीसँ विरोध एही ठाम होइछ। हिन्दीक प्राचीन पंथी लोकनि एतेक दिन धरि हिन्दीकें दूनू स्थान दिएबाक यत्ल कए रहल छलाह ओ छथि तएँ सफल नहि भए सकलाह। आब ओ लोकनि अपन क्षेत्र बूझि रहल छथि, अतः विकेन्द्रीकरणंक भावना उग्र रूप जागृत भेल जाइछ। जे राहुलजी हमरा सबहक मैथिली आन्दोलनक किछु वर्ष पूर्व मुजफ्फरपुरक वि० प्रा० हि० सा० (बिहार प्रांत हिंदी साहित्य) सम्मेलनक सभापतिक आसनसँ घोर विरोध कएने छलाह (जाहिपर हमरा ‘राहुलजीक अकारण कोप’ शीर्षक लेख 'मिथिला-मिहिर' मध्य देबए पड़ल) सएह महापण्डित राहुल सांकृत्यायनजी गत वर्षक जुलाई-अगस्त आदिक 'विशालभारत'क कतोक अंकमे प्रत्येक प्रान्तीय भाषाकें पूर्ण स्वतंत्रता देबाक मुक्त कंठे भैरवनिनाद कएने छथि। तहिना हमरा प्रान्तक सर्वश्रेष्ठ राष्ट्रीय नेता देशरत्न डा० राजेन्द्रो प्रसाद) आइ ने काल्हि अवश्यमेव अपना पूर्व निर्णयकें यथार्थ बुझताह। हमर ते ई निश्चित धारणा अछि जे मगही आ भोजपुरीकें साहित्य नहि छैक तैँ की? जखनहि कोनो अनिवार्य्य शिक्षाक क्रम जारी हेतक आओर ओकरा सफल बनएबाक उद्देश्य रहतैक तँ ओहू दूनू मातृ-भाषाकें निम्न वर्गक शिक्षा पद्धतिमे स्वीकार करहि पड़तैक। मैथिलीक योग्यता तें सब प्रकारें निर्विवादे अछि।


साभार-स्रोत

मैथिलीक दधीचि : बाबू भोला लाल दास ( पृ.- 217-224)
लेखक : शम्भुनाथ मिश्र
प्रथम सं. : 1991
प्रकाशक : कर्ण गोष्ठी, कलकत्ता

Saturday, June 21, 2025

डा० लक्ष्मण झा एक प्रखर व्यक्तित्व : मदनेश्वर मिश्र

डॉ. लक्ष्मण झाक जीवन आ कृतित्व सँ परिचित करेबाक उद्देश्य सँ श्री जयमंत मिश्रक एकटा लेख, एहि ब्लॉग पर अहि पोस्ट सँ पूर्व प्रकाशित कएल गेल छल। हुनकर लेख डॉ. सुरेश्वर झा क संपादन मे 2002 मे प्रकाशित डॉ. लक्ष्मण झाक किछु लेखटिप्पणी आदिक संकलन 'विचार-चिंतामणीमे प्ररोचनाक रूप मे प्रकाशित भेल छल। एहि क्रम मे पुस्तक मे मे सम्मिलित श्री मदनेश्वर मिश्रक लिखल एक टा महत्वपूर्ण संस्मरण प्रधान लेख उपरोक्त पुस्तकक संपादकक प्रति हार्दिक आभार व्यक्त करैत प्रस्तुत कएल जा रहल अछि।


डा० लक्ष्मण झा : एक प्रखर व्यक्तित्व


मदनेश्वर मिश्र

डॉ० लक्ष्मण झा एक प्रखर आ उच्चकोटिक विद्वान छलाह। ओ मैथिली भाषासाहित्यइतिहास आ अर्थशास्त्रक विशेष रूप अध्ययन कयने छलाह। मैथिली ओ मिथिलाक्षरक लेल हुनका अत्यन्त प्रेम छलनि। ओ पुरातत्वविद सेहो छलाह। भारत-छोड़ू” आन्दोलन मे जेल गेलाह आ ओतयसँ मुक्त भेलाक बाद बिहार सरकारक स्कॉलरशिप पर लन्दन विश्वविद्यालयसँ एम०ए० आ पी०एच०डी० करबालेल ओ इंगलैंड चलि गेलाह। 1947 ई० मे ओ एम०ए० आ 1949 ई० मे मिथिला एण्ड मगधविषय पर पी०एच०डी० लंदन विश्वविद्यालय सँ कयलनि। तकर बाद ओ स्वदेश वापस भ' गेलाह। एलाक किछु दिनक बाद ओ पटना विश्वविद्यालयमे अध्यापनक काज कयलनि। 1949 ई० सँ 1952 ई० धरि ओ जायसवाल शोध संस्थानपटनामे उपनिदेशकक पद पर काज कयलनि। तखन निदेशक छलाह स्वनामधन्य स्व० अल्तेकर। मुदा हुनका सँ डॉ० लक्ष्मण झा के पटरी नहि बैसलनि। 1952 ई० क प्रथम आम चुनाव मे सोशलिस्ट पार्टीक टिकट पर संसदक लेल चुनाव मे भागलेबाक कारणसँ डा० लक्ष्मण झाकें सरकारी सेवा छोड़य पड़लनि। दरभंगा संसदीय क्षेत्रसँ ओ चुनाव हारि गेलाह। तत्पश्चात्‌ किछु दिन ई सी०एम० कॉलेजमे इतिहासक व्याख्याता रहलाह। ओहि अवधिमे ओ मिथिला'” नामक मैथिली साप्ताहिकक प्रकाशन प्रारंभ कयलनि। किछु अंकक प्रकाशन भेलाक बाद ई बन्द भ’ गेल।
          ई प्रशंसनीय अछि जे लखन जी स्कूलक छात्रक समयसँ साइमन कमीशनक विरोध सँ 1942 धरि स्वतंत्रता आन्दोलनमे पूर्ण सक्रिय रहि भागलेलनि। लखनजी पहिने काँग्रेसमे छलाह आ बादमे सोशलिस्ट पार्टीमे सम्मिलित भगेलाह।
          बिहारमे कर्पूरी ठाकुरक नेतृत्व मे जखन सरकार बनल तँ 1977 ई० मे ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालयक नामसँ ललित बाबूक नाम सरकार द्वारा हटा देल गेलैक। ओहि समयमे हम एहि विश्वविद्यालयक कुलपति छलहुँ। हम कुलाधिपतिसँ भेटकए कहलियनिजे ई काज सरकार द्वारा उचित नहि भेल छैक। अपने जँ ललित बाबहूक नाम सरकार द्वारा पुनः जोड़बा सकी तँ ठीक छैक अन्यथा हम सरकारक एहि निर्णयक विरोधमे इस्तीफा दैत छी। अपने एकरा स्वीकार कएल जाओ। राज्यपाल डॉ० जगन्नाथ कौशल सेहो सरकारक एहि फैसलासँ दुखी छलाह। मुदा एक शालीन पदाधिकारी जकाँ सरकारक विरोधमे किछु बाजथि नहिं। हम तीन दिन निरन्तर राजभवन मे हुनकासँ अपन इस्तीफाक मंजूरीक हेतु निवेदन करैत रहलियनि। एहि बीच ओ सरकारहुँसँ विचार-विमर्श करैत रहलाह। मुदा हमरा सतत कहैत रहलाह जे भावनामे नहि बहू। अन्ततोगत्वा ओ हमरा जिद्द पर हमर इस्तीफा स्वीकार काएलनि आ हमरे आग्रह पर नव नियुक्त कुलपतिक नियुक्ति-पत्र सेहो हमरहि द' देलनि। डॉ० लक्ष्मण झाक नियुक्ति-पत्र ल' क' हम पटनासँ राति मे दरभंगा पहुँचलहुँ। डॉ० लक्ष्मण झाक नियुक्ति-पत्र हम अपन बधाईक संग तत्कालीन रजिस्ट्रार डॉ० शालिकनाथ मिश्रक हाथें हुनका पठा देलियनि आ हम भिनसरे दरभंगासँ पुर्णिया कॉलेजमे अपन प्रधानाचार्यक पद पर योगदान करबालेल विदा भ' गेलहुँ।
          जखन हम दरभंगामे कुलपति छलहुँ तँ डॉ० लक्ष्मण झासँ हमरा सम्पर्क बनल रहैत छल। कखनहुँ-कखनहुँ ओ हमरा किछु-किछु काजो करयलेल कहथि। एक दिन ओ हमरा टेलिफोन कयलनि जे एकटा डोम श्रीमल्लिक मिथिले विश्वविद्यालय सँ मैथिली मे एम०ए० पास कयने छथि। ई सामान्य बात नहि थिकैक। ओ हमरा कहलनि जे यदि संभव होइतँ विश्वविद्यालयमे हिनकर योग्यता देखि के कोनो पद पर नियुक्त कएलेल जाए। हम हुनका आश्वासन देलियनि जेँ अवसर अयला पर ओहि डोम विद्यार्थीक संग समुचित व्यवस्था कयल जेतैक। समय ऐलापर हुनक नियुक्ति विश्वविद्यालयमे तृतीय वर्गीय कर्मचारीक रूपमे कए लेल गेलनि आ ओ एखन मिल्लत कॉलेज मे प्राध्यापक पद पर नियुक्त छथि। एहि सँ ओ बड़ प्रसन्न भेल छलाह। प्रसन्न एहि कारणे जे समाजक निम्नतम वर्गक लोकक प्रति हमरहु ओहने सहानुभूति छल जेना हुनका छलनि।
          किछु दिनक बाद ओ पुनः टेलिफोन कयलनि आ कहलनि जे हुनका पता लागल छनि जे पंचोभ गाम मे हथिया नक्षत्र मे बिहाड़िक कारणें बहुत घर खसि पडल छैक। विश्वविद्यालयक काज हेबाक चाही जे एहेन विपत्तिक समयमे समाजक लोककेँ सहायता करय। हम हुनका कहलियनि जे हम हुनक विचार सँ सहमत छी। मुदा पहिने हम ओहि क्षेत्रक एहि समस्या सँ अवगत भए जाइ तखन हम अपने सँ विचार-विमर्श कए विश्वविद्यालय दिससँ समुचित कार्य करबाकलेल प्रवृत्ति होएब। हम ओही दिन कंसी-सिमरी आ पंचोभ दिस विदा भेलहुँ। हमरा धानक खेतमे किछ काज करैत गृहस्थ आ मजदूर सभसँ भेट भेल। ओ लोकनि हथियाक वर्षा सँ बड़ प्रसन्न छलाह। हम हुनका लोकनिसँ पुछलियनि जे घर सभ जे खसल छैक तकरासँ तँ बर्बादी भेल छैकओलोकनि कहलनि जे नहि एहन कोनो नोकसान नहि भेल छैक आ हमहूँ देखलियैक जे एक आधटा लटपटायल घर कतहु-कतडु झटक मे खसि पडल छलैक। ओलोकनि ईहो कहलनि जे हथियाक पहिने जे घर लटपटा जाइत छेक ओकर मरम्मत नहि क' खसबाक हेतु छोड़ि दैत छियैक जे खसलाक बाद ओकरा सांगोपांग उठायब। कहबाक अर्थ ई जे कोनो रिलीफक आवश्यकता नहि छलैक। डॉ० लक्ष्मण झा हमर रिपोर्ट! सँ अत्यन्त प्रसन्न भेलाह। हुनका दोसरो सूत्रसँ पता लागि गेल छलनि जे हथियाक वर्षा सँ कृषकसभ प्रसन्न छलाह। डॉ० लक्ष्मण झा पीड़ित वर्गक दुःख के देखि पसीज जाइत छलाह।
          यद्यपि ओ हमरा सँ उमेरमे जेठ छलाह मुदा अहू कारणेँ आदर दैत छलाह जे हम हुनका सँ पहिनहि ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालयक कुलपति भगेल छलहुँ। अनुशासनक सतत पावन्द!
          हमर पुत्र डॉ० रलेश्वर मिश्रमिथिला विश्वविद्यालयक स्नात्कोत्तर इतिहास विभागक अध्यक्ष हुनका बहुत प्रिय छलथिन। जखन हम विश्वविद्यालयमे छलहुँ तेँ श्रीरलेश्वर हमरे संग रहैत छलाह। मुदा हमरा गेलापर हुनका डेराक समस्या भगेलनि। हम डॉ० झाकेँ एहि सम्बन्धमे संवाद देलियनि तँ अत्यन्त आत्मीयतासँ ओहि समयमे उपलब्ध एक नीके डेरा हुनका आबंटित कयलथिन। आत्मीयताक निर्वाह मे हुनका कहियो कमी नहि रहलनि।
          कुलपति भेलाक किछु दिनक बाद ओ पुर्णिया कॉलेजक निरीक्षण करबाक लेल पुर्णिया गेलाह। हुनका कॉलेजमे पता चललनि जे अस्वस्थताक कारण सँ हम अवकाश पर छी। ई सुनतहिं ओ नवरत्नहातामे अवस्थित हमर आवास पर हमरा देखबाक लेल तुरन्त आबि गेलाह। प्रचंड रौद आ गर्मा छलैक। सुस्तयलाक किछुए कालक बाद कहलनि-''हमरा खीरा खाइक इच्छा होइत अछि। हम भीतरसँ बहुत गर्मीक अनुभव क' रहल छी।'' हम कहलियनि जे खीरा तँ हमरा बाड़िये मे अछि आ तुरन्त खीरा काटिकहुनका देल गेलनि। बहुत प्रेम पूर्वक ओ खीरा खयलनि आ किछु देरक बाद कहलनिजे हुनक मोन बिल्कुल शान्त भगेलनि अछि। केहन आत्मीयता! किछु ठहरिक' भोजन कयलनि आ भोजनक सामग्री हुनका एहि कारण बहुत उत्तम लगलनि जे सामग्री सादा आ ताजा छलैक तथा मसालाक कमसँ कम व्यवहार भेल छलैक। ई ओ बेर-बेर बहजलाह। मिथिला विश्वविद्यालयक गणित विभागक अध्यक्ष डॉ० बी०एन० झा सेहो हुनक संग छलथिन। संध्याकाल ओ हमर आग्रह कएलहुँ पर नहि रुकलाह। अपन कार्य-क्रमक अनुसार ओ दर्शनशाह कॉलेजक निरीक्षण करबाक हेतु कटिहार चल गेलाह। हुनक पोशाक छल अत्यन्त साफ धोती आ उज्जर चादरि। एहि सादगीक सोझाँ मे के नहि नतमस्तक भजाएतएही भेषमे ओ विश्वविद्यालय कार्यालय जाथि, दूर-दराजक कॉलेज-निरीक्षण मे जाथि। हुनक सोच-विचार सेहो सीधा आ स्वच्छ। एहि विलक्षण कुलपति केँ देखि लोकक मोनमे स्वतः श्रद्धा उत्पन्न भजाइक।
          किछुए समय बाद विश्वविद्यालयक कुलपति पद सँ ओ हटि गेलाह। मुदा रहन-सहनबात-चीतमे कोनो अन्तर नहि। तकर बाद ओ पूर्व विधायक प्रेमचन्द्र शास्त्रीक सारामोहनपुरक निवासमे रहय लगलाह। हम जखन दरभंगा आबी ते हुनक भेट करबालेल ओतय जाइ। ओ बड़ प्रसन्न होथि आ देरतक बैसाकगप्प करथि। पुस्तकसँ हुनका बड़ अनुराग छलनि आ हुनकर निजी पुस्तकालयमे मूल्यवान पुस्तकक संग्रह छलनि। हमरा स्मरण अछि जे मिथिला साप्ताहिक पत्रकजकर ओ सम्पादक तथा प्रकाशक छलाहसब प्रकाशित अंक के एकठाम जिल्द बन्हाकएहमरा देने छलाह। ओहि पत्रिकाक सामग्री आ विशेष रूपें सम्पादकीय लेख सभसँ ई स्पष्ट अछि जे ओ मिथिला आ मैथिलीक प्रचार ओ प्रसारक लेल कोनो त्याग कसकैत छलाह। मैथिल संस्कृति हुनका रगरगमे भीजल छल।
          समाज सेवापर हुनका बहुत ध्यान रहनि। ओतँ हमरहुँसँ समाज-सेवा करबाबय चाहैत छलाहजाहिमे हमरा आपत्ति नहि छल। दरभंगामे हम जखन कुलपति छलहुँ तँ डॉ० अरुण कुमार मिश्रकेँजे सी० एम० कॉलेज मे प्राध्यापक छलाहओ एहि कारणें मानैत छलथिन जे समाज-सेवा सम्बन्धी जे काज ओ हुनका करय कहथिन से ओ सहर्ष आ रुचिपूर्वक करथिन।
          हम डॉ० सुरेश्वर झा केँ हृदयसँ धन्यवाद दैत छियनि जे ओ एहेन ऋषितुल्य व्यक्तिक जीवनक प्रमुख घटना आ विचारक संकलन तैयार कयलनि। हिनकर अध्यवसायिकता आ डॉ० लक्ष्मणझाक मिथिला ओ मैथिलीक प्रेमक लेल हिनकर आदर आ निष्ठा स्तुत्य अछि। 'विचार चिन्तामणिक संग्रहक लेल हम हुनका पुनः पुनः धन्यवाद दैत छियनि। डॉ० लक्ष्मण झाक स्मृति मे ओ ई एक गोट अनुपम काज कयलनि अछि।

[कलशस्थापन/28-9-2000]
 
संदर्भ
विचार चिंतामणि
डॉ० लक्ष्मण झा
संकलन एवं संपादन- डॉ० सुरेश्वर झा
प्रकाशक- मिथिला मण्डलदरभंगा
प्रकाशन वर्ष- 2002
पृष्ठ- XV-XVIII

Friday, June 20, 2025

कीर्तिर्यस्य स जीवति (लक्ष्मण झा प्रसंग) : जयमन्त मिश्र

मैथिली भाषा-अस्मिताक अलख जगौनिहार मे डॉ. लक्ष्मण झा क विशिष्ट स्थान छन्हि। हुनका मिथिला राज्य आंदोलनक पुरोधा कहल जाइत छन्हि। ओ असमानांतर प्रतिभा आ योग्यता सँ संपन्न व्यक्ति छलाह। सुविधा आ भौतिक उन्नतिक सहज  उपलब्ध अनेक रास अवसर केँ अस्वीकार कए ओ अपन जीवन मैथिली आ मिथिलाक लेल समर्पित कदेलन्हि। मिथिला सन ऊसर-चेतनाक क्षेत्र मे जाहि जीबटता आ जुनूनक संगहि ओ काज केलनिओ सबदिन अनुकरणीय रहत। ओ दृढ़ नैतिक मूल्य सँ अनुशासित एक कठोर तपस्वी जीवन जीबैत रहलाह। मिथिलाक नव पीढ़ी हुनका विषय मे जानि कृतज्ञ आ प्रेरित होए ई आवश्यक अछि। हुनकर बहुत रास महत्वपूर्ण काज एखन धरि असंकलित अछि। एहि दिसा मे हमरा लोकनिक ध्यान जायब अत्यंत आवश्यक अछि।

    डॉ. सुरेश्वर झा क संपादन मे हुनक किछु लेख आ टिप्पणी आदिक संकलन 'विचार-चिंतामणीक नाम सँ 2002 मे प्रकाशित भेल छल।किताब मे सम्मिलित कएल गेल किछु अन्य सामग्री डॉ. लक्ष्मण झाक जीवन आ कृतित्व सँ परिचित होएबाक उद्देश्य सँ उपयोगी अछि। श्री जयमंत मिश्रक ई लेख पुस्तक मे प्ररोरचना क रूप मे प्रकाशित अछि। लेख उपरोक्त पुस्तक सँ संपादकक प्रति आभार व्यक्त करैत प्रस्तुत कएल जा रहल अछि। 

लगभग साढे सात बरख सँ ‘मैथिली मंडन’ ब्लॉग पर कोनो सामग्री पोस्ट नहि क’ सकल छलहुँ। एहि लेल हार्दिक खेद अछि। आशा करैत छी जे आगां एहेन दीर्घ विरामक स्थिति नहि बनय।


कीर्तिर्यस्य स जीवति  (लक्ष्मण झा प्रसंग

जयमन्त मिश्र

डॉ० लक्ष्मणझा,  आदरणीय लखन जीमिथिलाक ओ विभूतिभारतक ओ सपूत छलाह जकरा पर मिथिले नहि सम्पूर्ण भारतके गौरव छैक। ओ सात्त्विक गुणक साकार रूप ओ सात्त्विक विचारक मूर्तिमान स्वरूप लाह। हुनक आहार-व्यवहार तथा वेश-भूषा सर्वथा सात्विक छलनि। साफ च्छ धोती आ उज्जर दपदप तौनी हुनक मुख्य परिधान छलनिजे भव्य भालक अभाग छरहर देह मे बहुतनीक लगैत छलनि।
स्वच्छ विचारक अनुरूप व्यवहार हुनक जीवन-पद्धतिक विशिष्ट अंश छलनि। अपन सिद्धान्तक विपरीत दोसर विचार सँ समझौता नहि करब हुनक अभ्यास छलनि।
    हमर अग्रज प्रख्यात अभियन्ता प्रो० राजेन्द्रमिश्र आ डा० झा समवयस्क छलाह। दूनू व्यक्ति 1949-50 ई० मे उच्च शिक्षा-प्राप्तिक हेतुसंगहि लन्दनमे रहैत छलाह। डा० झा पी-एच०डी० डिग्री लए लन्दन से अपन देश वापस आबिरहल छलाह। हम ओहि समय पटना विश्वविद्यालयमे छात्र छलहुँ।
    भैया पत्र सँ सूचित कएलनि जे लखन जी पटना पहुँचि रहल छथि। कंचन भवनमे डा० सुभद्रझाक संग ठहरताह। हुनकासँ सविस्तार समाचार ज्ञात होएत।
    प्रायः 50 ई० क जनवरी छलैक। बारह बजे दिन मे हम डा० झा सँ भेटकरबाक हेतु कंचन भवन गेलहुँ। डा. झा बाहर रौदमे पटिया पर बैसलभीतर पाकक्रिया मे संलग्न डा. सुभद्रझासँ , गप्प कए. रहल छलाह। हम पैर छूबि प्रणाम करैत अपन नाम कहलियनि। आउ-आउ कहि स्नेहसँ अपने लगमे बैसौलनि। ई अपन पी.एच.डी.क प्रसंग लन्दन मे अपन गाइडक संग सैद्धान्तिक मतभेद पर बात कए रहल छलाह। एही प्रसंग ई डा. सुभद्रझासँ कहलथिन जे हम अपन गाइड केँ 'हरदीबजाइएक छोड़लियनि। ओहिना मन अछिडा. सुभद्रझा कड़छु मे देल कड़ू तेलसरिसौमिरचाइ के चुलहा पर पटकिभीतरसँ दौड़ि 'लखनजी अओ लखन जीबहुत दिनुक बाद हरदी बजएबाक बात अहाँ मुहें सुनल अछिई कहैत हुनका भरि पाँज पकड़ि पटियापर बैस गेलाह। किछुकालक बाद कहलथिन जे आलूक साना तैयार अछिभात भइए गेल अछि। आब चलू बिनु छौंकले दालिक संग भोजनकए पटना मार्केट चली आ ओतहि अहाँ केँ तौनी कीनि दी। भोजनकए जाबत सुभद्र बाबू गंजीकुर्ता पहिरि बाहर आअएलाहओही बीच डा. झा संक्षेपमे लन्दनक समाचार आ भैयाक कुशलादि कहलनि। हुनक उक्तिमे अग्रजक स्नेहक अनुभूति भए रहल छल।
    दूनू डाक्टर लगले पटना-मार्केट चललाह। हमहूँ पाछाँ लागल मार्केट धरि अएलहुँ। ओतए एक दोकान पर ''यहाँ सभी प्रकारके वस्त्र मिलते हैं" एहन साइन बोर्ड देखि ओकरा सँ तौनी मंगलखिन। प्रायः तौनीक अर्थ नहि बूझि ओ कहलकैन 'नहीं है'। एहिपर दूनू गोटे एकस्वर सँ कहलथिन जे यातँ तौनी आनू या अपन साइन बोर्ड के उठाक फेकू। ई लोकनि तौनी क बदला चादरि मांगलए तैयार नहि। दोकानदार तौनी बुझैत नहि। अन्ततः ओ अनुनय विनय पूर्वक कलजोड़ि हिनका लोकनिकेँ विदा कएलक।
    डा. झाक जीवन-यात्रामे विपरीत परिस्थितिक संग समझौता नहिकरबाक हुनक अटल सिद्धान्त हुनका कतहु विशिष्टपद पर स्थिर नहि रहए देलकनि एहि बातक सविस्तार चर्चा डा. सुरेश्वर झा हुनक परिचयक प्रसंग कएने छथि।
    हम बिहार विश्वविद्यालयमुजफ्फरपुर मे जखन संस्कृत छात्र संघ तथा मैथिली छात्र संघ दूनूक अध्यक्ष छलहुँ तखन दूनू संघक संयुक्‍त वार्षिक अधिवेशनमे संस्कृत मैथिली दुहुक ज्ञाता विद्वान केँ अध्यक्षता करबाक हेतु आमन्त्रित करतै लियनि। ओहिक्रममे एक बेर डा. लक्ष्मणझा अध्यक्षताक हेतु आएल छलाह। विहार विश्वविद्यालयक विद्वन्मण्डलीमे डा. झाक अध्यक्षीय भाषण बहुत विशिष्ट भेल छलनि। मैथिलीक प्रसंग हुनक बहुत उपादेय सुझाव सब भेल छलनि। ओहि अवसर पर मैथिली-कविसम्मेलनमे अनेक मैथिलीक कवि आएल छलाह। हुनक सुझावक बादो कविलोकनि मार्ग-व्ययक रूपमे विदाई नेने छलाह से डा. झा देखैत छलथिन।
    सबके गेलाक बाद जखन हुनका मार्ग-व्यय मात्र लेबाक आग्रह कएलियनितँ कने रुष्ट भए ओ कहलनि-''हमरो कविए बूझि लेलहुँ कीहम मौन भए सब सूनि प्रणाम कएलियनि। रिक्शा पर संगमे बैसि बस-स्टेण्डधरि आबिबसपर चढ़ाए पुनः प्रणाम कए वापस भेलहुँ।
    1978 ई. मे जखन ओ “मिथिलाविश्वविद्यालयक कुलपति छलाहतखन 8 मार्च, 78 के हम हुनक बेलाक पुरना डेरामे भेट करए गेल छलियनि। 11 बजे दिनक समय छलैक। ओ आंगनक चापाकलमे चाउर धो रहल छलाह। चुलहापर अदहन खौलाइत छलनि। कहलनि-अहाँ बैसू। हम चाउर लगाक ओहिमे आलूदए देत छियैक तखने अहाँ सँ गप्प करब।
    हमर जिज्ञासा भरल आँखि देखि ओ कहए लगलाह-विश्व विद्यालयक नोकरभनसिया के अपन काज नहि करए दैत छियैक। हम कतेक दिन कुलपति रहब तकर कोनो ठेकान नहि। कर्पूरी के कहि देने छियेक जे कखनहु हम छोड़ि देब। एही कारणें कुलपति-निवासमे नहि रहैत छी। मदनेश्वरजी ओहिमे रहि बहुत राहड़ि लगौने छलाह। तैयार होयबासँ पहिने छोडिकचल गेलाह। हम तैयार कराएसबटाके उचित मूल्यपर बेचि विश्वविद्यालयक कोशमे जमा करवा देलियैक अछि। हम कहलियनि-अपने जखन वेतनो मे केवल एकेटा रूपया लैत छियैकतखन और वस्तुक कोन बात।
    'हैँहमर इहोशर्त मानिएकए कर्पूरी हमर नियुक्ति कएने अछि'। जनैछीआइ कालिजे मध्यम मार्गी लोक अछि सैहटा कुलपतिक पदपर बनल रहि सकैत अछि। हम जनैत छी जे हम एकभगाह लोकछी। कतेक काल धरि कतए रहब तकर कोनो ठेकान नहि। मन पड़ैत अछिराजेन्द्र बाबूक संग लन्दनक ओ जीवन दूनूगोटे ओतए बड़ प्रसन्न रही।
    ताधरि चाउर सिद्ध भएगेल छलनि। आलूक साना बनौलनि। हमरो पुछलनि। ओहि दिन दालि नहि बनौने छलाह। आलूक सानाक संग प्रेमपूर्वक भात खएलनि। किछु काल गप्प कए विश्वविद्यालय विदा भेलाह। प्रायः साल भरि रहिपुष्कर पलाश वन्निलिप्तिओ कुलपति पदकेँ त्यागि देलनि।
    हम जखन संस्कृत विश्वविद्यालयमे कुलपति छलहुँप्राय: 84 ई.क बातथिकडाक्टर साहेब अस्वस्थ भए दरभंगा मेडिकल कॉलेज अस्पतालक पेयिंग वार्ड मे छलाह। भेट करए जाइत छलियनि। जखन स्वस्थ भए ओतए सँ अएबाक दिन निश्चित भेलनि तँ हम निवेदन कएलियनि जे एतएसँ जएबाकाल हम गाड़ी नेने आएब आ डेरापर पहुँचादेब।
    ओ कहलनि-गाड़ी अहाँक अपन ते नहि थिक। विश्व विद्यालयक गाड़ी सँ ओना जाएब ठीक नहि। कोनो व्यवस्था भए जएतैक। अहाँ केँ एहि हेतु बहुत-बहुत साधुवाद।
    अन्तिम भागमे डा. झा मोहनपुरमे एक इष्ट व्यक्तिक डेरामे रहेत छलाह। एकदिन ओतए भेट करए गेल छलियनि। कहलनि जे  आइकालि एकमास एतएएकमास गाममे रहैत छी। गाम गेल छलहुँ। हमर भौजीजनिका हमरा प्रति बहुत स्नेह रहैत छनि आ पूर्वमे हमर कुलपति रहबाक भावनो रहैतछनिकहलनि जे एहिवेर अपना खेतये धान बहुत कम भेल। खेसाड़ी बढ़ियाँ भेल अछि। खेसाड़ी बेचिकएथोड़ेक चाउर लए लैत छी। हम कहलियनि अपना खेतमे जे उपजल अछि हम सैहटा खाएब। खेसाड़ीक रोटी हमरा नीक लगैत अछि। हमर बात मानि ओ खेसाड़ीक रोटी बनबैत रहलीह।
    डाक्टर साहेबक एक अन्तरंग मित्रसँ एकदिन हम पुछलियनि-डा. साहेब वैवाहिक जीवनसँ एना विरक्‍त कियैकरहलाह। ओकहलनि-जखन लखनजीक ओ अवस्था छलनि ते हुनकासँ ई जिज्ञासा कएने छलियनि। ओ कोनो संस्कृतज्ञक मुहेँ सुनल एक श्लोक सुनौलनि-
जनितो मनुजो द्विपदस्तु सदाप्रियया सहितश्चतुरंग्रिरभूत्‌ पशुवत्‌,
जनितेन सुतेन च षट्चरणो भ्रमतीह पुनर्भुवि षटपदवत्।
तनयात्‌ तनयः प्रभवेच्च यदा अरूणद्धि स्वयं मकरीकृमिवत्‌
अधुनापि मनुष्य तनुं विदधत्‌किमु संभज नन्‍दसुतं मुनिवत्‌।।'
विवाह सँ पूर्व लोक 'द्विपद मनुष्यरहैत अछि। पाणि ग्रहणक बाद और दू पैर क संग 'चतुष्पदपशु-तुल्य भए जाइत अछि। जखन सन्तति होइत छैक तखन और दू चरण जोड़ि 'षट्पद भ्रमरक समान बनि जाइत अछि। सन्तति सँ जखन सन्‍तति होइत छैक तखन मकड़ाक जालमे फँसि जाइत अछि। जाधरि मनुष्य-शरीर धारण कएने रहैछ तावतेधरि मुनिजन जकाँ ईश्वरक ध्यान कए सकैत अछि। तपस्वी मुनि जौं नहियो बनि सकी तँ मनुष्यधरि बनल रहीई अभिलाषा अछि।एहिसौं डा. झाक मनोभाव केँ जानल जा सकैछ।
    'हरि अनन्त हरि कथा अनन्ताजकाँ डॉ. लक्ष्मणझाक जीवन-कथा अनन्त अछि। हुनक जीवन-यात्रामे सबसँ पैघ विशेषता ई देखल गेल अछि जे ओ जाहि सिद्धान्त के मानैत छलाह ओकर अक्षरशः अपन जीवन मे अनुपालन करैत छलाह। ' त्यागात्‌ शान्तिः'' एहि तथ्यकेँ मानि आजीवन त्यागीबनि निष्काम कर्म करैत रहलाह। ''ज्ञानं भारः क्रियांविना'' एकरा बुझैत अपन ज्ञानकेँ व्यवहारमे चरितार्थ करैत रहलाह। कामपर विजय प्राप्त कए क्रोध ओ लोभकेँ निरस्त करैत रहलाह।
     यस्तु क्रियावान्‌पुरुषः स विद्वान!" एहि सदुक्तिक ओ ज्वलन्त उदाहरण छलाह। एहन त्यागीतपस्वीमनस्वीमनीषीक पुण्य-स्मृतिमे “विचार चिन्तामणिक प्रकाशन अत्यन्त श्लाध्य प्रयास थिक। एहिमे डा. झाक मिथिलामैथिलमैथिली क उत्थानक दिशा मे सुचिन्तित विचार संकलित अछि। देशक राजनीतिशिक्षादीक्षाक प्रसंग हुनक भावना संगृहीत अछि। हुनक प्रकाशितअप्रकाशित कृतिक विषयपर सूचना देलगेल अछि। हुनक जीवन-यात्राक सविस्तार प्रामाणिक विवरण प्रस्तुत कएल गेल अछि। एहिमे हुनक अपन कटु-मधु अनुभवक दिग्ददर्शन भेटैत अछि।
    एतदर्श डा. सुरेश्वर झाजीकेँ शतशः साधुबाद दैतछियनि जे ओ बहुत परिश्रम आ पूर्ण मनोयोग सँ सब सामग्री केँ संकलित कए पुस्तकाकारमे एकरा प्रस्तुत कएने छथि।
विश्वासअछिवर्तमान संघर्षमय जीवनमे लोक एहि “'चिन्तामणि'' क प्रकाशमे चिन्ता सँ दूर रहबाक प्रयास करत। इतिशम्‌।
[अनन्त चतुर्दशी/12-9-2000]

संदर्भ
विचार चिंतामणि
डॉ. लक्ष्मण झा
संकलन एवं संपादन- डॉ. सुरेश्वर झा
प्रकाशक- मिथिला मण्डलदरभंगा
प्रकाशन वर्ष- 2002
पृष्ठ- IX-XIII

Tuesday, December 12, 2017

अपन अयनामे धूमकेतु : धूमकेतु

मैथिली कथा साहित्यक एकटा प्रतिष्ठित नाम थिक- धूमकेतु । हुनकर एतय प्रस्तुत कएल जा रहल आत्मकथ्य केँ महत्वपूर्ण मानबाक कतेको कारण छै । एहिसँ धूमकेतु, हुनक निर्माण, हुनक परिवेश, हुनक दृष्टिकोण आ हुनका बहाने मैथिली साहित्य आ मिथिलाक इतिहासक कतेको आन प्रसंग केँ जानबाक अवसर भेटैत छैक । एहि आत्मकथ्यक सबसँ पैघ विशेषता छै, धूमकेतुक स्पष्टवादिता आ रचनात्मक ईमानदारी । धूमकेतु अपन सामंती संस्कार आ ताहिसँ निकासक छटपटाहटि केँ तँ स्वीकार करिते छथि, अपन पिताक व्यक्तित्व केर द्वैत्व केँ साफ-साफ प्रकट करबा सँ सेहो, हुनका कोनो परहेज नहि छन्हि । धूमकेतुमे आत्ममुग्धता आ आत्मप्रचारक प्रवृत्तिक नितांत अभाव देखार पड़ैत छैक, जकरा सामान्य मैथिल संस्कारक अपवादे कहल जा सकैत अछि ।  
एहि आत्मकथ्यक पहिल प्रकाशन कतय भेल छलहि, वा एकर मूल स्रोत की थिकै, से हमरा नहि बूझल अछि, मुदा एतय स्रोतक रूप मे देसिल बयना’, हैदराबादक जाहि स्मारिकाक उपयोग कयल गेल छैक ताहि मे एकरा राँचीसँ प्रकाशित पत्रिका ‘रचनाक अक्टूबर-दिसम्बर2003 अंक (पृष्ठ 4-6) सँ साभार लेबाक सूचना देल गेल छैक ।

अपन अयनामे धूमकेतु
_____________________________________
धूमकेतु


[पृ.-51]
जन्म हमर एहन परिवारमे भेल जतए समय बिताएब पहाड़ रहै छै । शरीरसँ कोनो काज करब हीन ओ करबाएब चतुरता मानल जाइत छैक । तज्जन्य हानि तँ बहुत भेलए एकाधटा लाभो  देखैमे अबैत अछि । जेना अखराहापर छड़ीक हाथेँ पठाओल गेल छी । मामूली गायन कियो अशुद्ध कऽ लेता तँ से नै बुझैमे आओत, से बात नै । आ सभसँ पैघ लाभ जे खिस्सा-पिहानी, पुस्तक- पत्रिकाक सान्निध्य बड़ नेनासँ रहल । पहिल शिक्षक छला - रानी टोलक पंडित घनानन्द झा । लोटा शब्दक सन्धि-विच्छेद धरि ओ मोन पड़ैत छथि । विद्या-व्यसनी केहन छला जे हुनक  लिखल घटकराजगोत्र-मूल-पाँजि आदि-आदि लौकिकताक पोथी घर-घर पहुँचल । अक्षरक ज्ञान हमर माइयोकेँ छलनि । पिता एकटा प्रेस संचालन करैत छला । विचारसँ गाँधीवादी छला, क्रियासँ सामन्त, तेँ शरच्चन्द्र आ प्रेमचन्द्र हमरा बहुत नेनासँ उपलब्ध होइत रहला । चाँदक फाँसी अंक हम पिताक तकिया तरसँ चोरा कऽ माइक सेवामे प्रस्तुत कऽ चुकल छी । हमरा लगैत अछि, अइसभ वातावरणक प्रभाव हमरा अवचेतनमे साहित्यक प्रति लगावकेँ जन्म देलक । तेँ फरिछा कऽ कहबो केलौं । तकर बाद जे मोन पड़ैत अछि, से अही लगावक विस्तार । 

राज इसकुल दरभंगाक जीवन पहिले पहिल मैथिली शब्दसँ परिचित  करौलक । हमर बाल-मन अवश्य गौरवान्वित भेल छल जे ओ जे हम बजै छी, एकटा भाषा थिकैक । कुमार गंगानन्द सिंहक आवास सचिव सदनकहबनि । प्रायः अइ लेल जे ओ महाराज दरभंगाक आप्त सचिव छलथिन । राजेक बंगलामे रहैत छलथिन । बड़कीटा नेमप्लेटक नीचाँमे रईस, श्रीनगरलिखल छलैक, ‘आप्त सचिवनै । कुमार साहेब बिहार राज्य हिन्दू महासभा आ नैशनल वार फ्रन्ट, दुनूक राज्याध्यक्ष छला । संगहि तत्कालीन जे साहित्यकारलोकनि छलाह तनिक आवागमन निरन्तर होइत रहनि । जे सचिव सदनक छात्र बाटहुमे भेटैत रहलाह ताहिमे हीरानन्द शास्त्री (आर्यावर्तक पूर्व सम्पादक) आ जितेन्द्र किशोर झा (टिस्कोक जनसम्पर्क अधिकारी) स्मरण अबैत छथि । जहाँ धरि मोन पड़ैत अछि, रचैक स्पृहा जेना ओइ बएसमे सभकेँ होइत छैक, हमरो भेल । महाराजाधिराज, दोसर विवाह मंगरौनी केने छला आ दरभंगासँ मधुबनी धरि स्पेशल ट्रेनमे बरियाति साजि कऽ कोबर करए मंगरौनी जाइत छला । ताहि शुभ अवसरपर आदरणीय गोलोकवासी मधुपजी कोबरगीत लिखने छला आ महाराज पाँच सए टाका पुरस्कार देने छलथिन । अयनामे जे पहिल हर्षित चेहरा उभरैत अछि, से अही बातपरक । प्रभाव केहन जे ओ रचना जे हम तत्काल प्रारम्भ कऽ देने रही सरकारमे दाखिल करैक लेल, तकर पाँती एखनो मोन अछि, यद्यपि अर्थ लगेबामे अपनो असौकर्य होइत अछि –
अहि-रिपु-पति-तिय सदसानीन
उर- माला- कर- शोभित  बीन
गोपी   –  वल्लभ   श्रीभगवान
रचल  काव्य  धय हुनके ध्यान
ई नै बुझि लेब जे ई पाँती हमर मा निषाद प्रतिष्ठांथिक । डंड-बैसक पहिनोसँ प्रारम्भ छलैक ।

ओहि समयक एकटा घटना मोन पड़ैछ । बीचमे ई बुझि लेबाक थिक जे सचिव-सदन साहित्य आ भाषा - हिन्दी आ मैथिली - दुनूक केन्द छल । दिनकर आ राजा राधिकारमण अधिक काल पाहुन होइत छला । आचार्य रमानाथ झा, डॉ. सुभद्र झा, पंडित जयदेव मिश्र घंटो ओइ विवादमे प्रत्येक दिन शामिल होथि जे मैथिली वा हिन्दी भाषा-साहित्यक अभ्युन्नतिक लेल [पृ.-52]होइक । ताही दिनुक एकटा आर चित्र उभरैत अछि । शिशु मैथिली साहित्य परिषदक स्थापना दरभंगामे कयल गेल छलैक । उद्येश्य छलैक गामक प्राइमरी स्कूल धरि मैथिलीक चेतना जगाएब । मधुबनीमे प्रथम सम्मेलन भेल छलैक । अध्यक्षता केने छलाह प्रयाग विश्वविद्यालयक राजनीति विभागक छात्र पंडित चेतकर झा आ स्वागताध्यक्ष छलाह राँटीक श्रीमान् बाबू साहेबक बालक । जहाँ धरि हमरा मोन अछि, प्रायः 1945 ई. मे । हमरालोकनि राज स्कूल दरभंगासँ डेलीगेट भऽकऽ गेल रही - मणी भायक नेतृत्वमे । कवि-गोष्ठी आयोजित भेल छलैक । हमर रचना जे शास्त्रीजी गढ़ि देने छलाह, से ट्रेनसँ पौदानपर यात्रा करैक हीरोपनीमे उपरका जेबीसँ कतौ उड़ि गेल । स्मरणसँ हबड़-हबड़ लिखि तँ लेलौं मुदा बात जमलै नै ।

अही सभ कूद-फानमे भेलै जे आइसँ हमसभ आजाद । ने लाहौर हमर, ने ढाका । छौंड़ासभ साँस छोड़लक चल भाइ, परीक्षामे भारतक नक्शामे लंका-वर्मा छुटि गेने आब नम्बर नै कटतौ ।

स्वातंत्र्योत्तर काल हमर वैचारिक स्थिरता काल छल, तेँ उद्वेलनो चरमपर छल । अही कालमे हमरा लागल छल जे आचार्यलोकनिक देखाओल उद्येश्य आब काव्यक नै भऽ सकैत अछि । शोषण-उत्पीड़न केर अर्थ बुझऽ लगलियैक । बताह पतिक संग एकसरि रहैत बहिनिक सुख-दुख देखलियनि । ओइ विशाल सामन्ती परिवार, जकर पूर्वमे चर्चा कएल अछि, तकर धूरीमे अपन माए देखा पड़ली । गंगाइक पीठपर हमर गाँधीवादी पिता द्वारा बरिसाओल छड़ीक दागपर माएक देल नारिकर तेल लऽ जाइत हमरा कोनो विद्रोहक भाव मोनमे आएल हो, से नै मोन पड़ैत अछि । मुदा हम जाहि कालक जिक्र कऽ रहल छलौं, ताहिमे हमर मन ई निश्चित रूपसँ मानि लेलक जे हमरालोकनिक उद्धारक मार्ग मात्र मार्क्सवादी चिन्तनधारा भऽ सकैत अछि । उद्धारसँ हमर तात्पर्य दूटा अछि - पहिल, प्रचलित जीर्ण सामाजिक मूल्यसँ जे समसामयिक विडम्बनाक व्याख्या नै कऽ सकैत अछि आ दोसर जे मनुक्ख स्पष्ट रूपेँ मनुक्खक रूपमे स्थापित हो ।

अयनामे जे चेहरा उभरैत अछि, से हाटक गाछीमे टएर गाड़ीपर ठाढ़ भऽकऽ बहुत फड़कैत अल्फाजमे बहुत आग्नेय कविक वा सकरीसँ जयनगर धरि बिना टिकटक यात्रा, ‘जनशक्तिक प्रति बेचैत, नौटंकी स्टाइलमे शेर पढ़ैत कविक । अही कालमे मैथिलीसँ संग छुटि गेल । कतए की भऽ रहल छैक, उत्सुकतो खतम भऽ गेल । किछु उल्लेखनीय भैयो नै रहल छलैक । अही कालमे आदिवासी क्षेत्रमे कार्य करैत हमरा अनुभव भेल छल जे मातृभाषा कतेक महत्त्वपूर्ण थिक । कानून बना कऽ अंग्रेज अंग्रेजीएमे राजकाज चला गेल । मुदा, मनुक्खक जाहि मुक्तिक चर्चा हम ऊपर कएल अछि, से बिना मातृभाषाक कोना हएत? हमरा, मैथिलीमे एकटा सांस्कृतिक क्राइसिसक बोध अही कालमे भेल छल । मिथिला-मैथिल-मैथिली - हमर बाल मनपर ई अभिलेख छल । आ एकर उपयोगिता लोकक संग काज करैत काल बुझने छलियैक । हम आइयो एहि बातकेँ मानैत छी जे, जँ मिथिला तँ ताहिमे रहैवला मैथिल आ तनिक भाषा मैथिली । जनतंत्रमे सरकारो अही क्रममे जन तक पहुँचि सकत आ जन सेहो अपन सरकार अपने बना सकता । अही मानसिक स्थितिमे हम आज पावस की निशा में फिर तुम्हारी याद आई सँ बाहर भऽकऽ ई देवता छथि पाथरक खएता मुदा मिष्टान्न हलुवाधरिक यात्रा केने छलौं ।

तकर बादक जे अयना अछि ओहिमेक चेहरा सभकेँ देखा पड़ैए । हम बलौं ओकर बखान करी, बहुत झंझट ।

सभ छान-पगहा तोड़ि-ताड़ि जखन हमरा अपन पारिवारिक ताना-बाना आर्यावर्तक उपसम्पादकी छोड़ा कऽ जनकपुर पहुँचा देलक, आटा-दालिक भाव बाजारमे बूझब अनिवार्य भऽ गेल । ता मिथिला मिहिरसेहो उपलब्ध भेल । मिथिला मिहिरमाने एहन अयना, जाहिमे सभक चेहरा झक-झक देखाइए । ओकर फाइलसँ ई बात बुझल जा सकैत अछि । हमर चेहराक रंग बदलल लागत 1965क बाद । ओतय हम अपन मौलिक रूपमे छी । जे संचित अर्जित लबादा छल, प्रायः हम ओइसँ बहरेबाक यत्न करैत रहल छी । सीता, जे हमरालोकनिक आदर्श थिकी, ओ समस्त मैथिलानी जातिकेँ आइ दुर्गतिक पराकाष्ठापर पहुँचा देने छथि ।  प्रत्येक मैथिलानीमे जीबैत [पृ.-53]सीताक समर्पण-भावनाकेँ अपमानित-लांछित होइत देखि कऽ हम चुप नै रहल छी - 1951मे प्रकाशित अपन दीदीकथासँ लऽकऽ आइ धरि ।

स्वजातिकेँ वस्तु बनाकऽ ओकरा संगेँ पशुवत व्यवहार हमरासभक एहन परम्परा थिक, जाहि दिस कनेको ध्यान नहि जाइत अछि - नै, स्त्रीजातियोक नै । अही वितंडावाद सभपर प्रकाश दैत एकटा कविता लिखने रही - एक बेर फेर राजधानीमे ।भीम बाबूकेँ देलियनि । मुदा ओ जब्त भऽ गेल । दू वर्षक बाद देवीजी हटली तँ भीम भाइकेँ प्रकाशित करैक अनुमति भेटलनि । अनुमतिक बातपर एकटा आर बात मोन पड़ैत अछि - अगुरबानक प्रकाशनक बाद जे पत्र आयल ताहिमे एकटा ललितजीक सेहो छल । लिखने छलाह - मनुक्खमे कतौ देवतो छैक, तकरो अन्वेषण हेबाक चाही ।प्रतिक्रियास्वरूप एकटा खिस्सा लिखाएल - मनुक्खक देवता ।अइ बेर सरकार नै, प्रकाशक जब्त कऽ लेलनि । ओ हेराइए गेल । बहुत बाद भऽकऽ संयोगसँ ओकर प्रति भेटल, तेँ बाँचल  । जे-से ।

प्रायः 1966-67मे आदरणीय किसुनजी सुपौलमे आधुनिक मैथिलीक शंख फुकने छलाह । हम प्रारम्भसँ पत्राचार द्वारा समस्त कार्य-कलापसँ जुड़ल रहलौं । मुदा ऐन अधिवेशनक समय हमरा अगत्या सिमरियामे बिताबए पड़ल छल । मुदा धीरू बाबू (प्रो0 धीरेश्वर झाजी) हमर एकटा कविता लऽ गेल छलाह आ सभामे बाँचनौ छला । जे प्रतिक्रिया कहैत आएल छला ताहिसँ हमर अद्यावधि विश्वास अछि जे कविताक संवेदनशील श्रोताक मादे सुपौल सभसँ आगू अछि । सुपौल नै जा सकबाक मजबूरी अन्ततः हमर मूक भऽ जेबामे फलित भेल छल । जँ अनिवार्यतः शब्द वापसो आएल तँ अनिवार्ये कार्यक हेतु । वैह मजबूरी हमर व्यक्ति, दृष्टि, रचनासभसँ परिलक्षित हएत।

अयनामे  हमर एकटा नव चेहरा  उभरैत लगैत अछि ।  एकटा प्रौढ़ धूमकेतुक ।  समस्त  घृणा-उपेक्षाक बीच भगजोगनी जकाँ अपनेमे जरैत धूमकेतुक । एहन धूमकेतुक जनिक चेहरा सभकेँ स्पष्ट देखाइत छनि । अपनेसँ व्याख्याक आवश्यकता की? मित्रगणक विशेष चर्चा हमरा कखनो अभीष्ट नै रहैत अछि । ओना बाबा आ अपन बीचमे हमरा दूटा धूमिल चेहरा अयनामे झलकैए - माथुर आ राघवाचार्य । मुदा हम, ने मैथिली साहित्यक अध्येता छी, ने ओकर इतिहास-भूगोलक ज्ञाता । जे रचै छी से मैथिलीमे, कारण हमर जे रचना-उपकरण छथि, जनिक हमरा प्रत्यक्ष ज्ञान अछि, से मैथिल थिका आ मैथिली बजै छथि । तेँ हमर दृष्टिदोषक व्याख्या तँ कोनो मैथिलीदाँए कऽ सकता ।

अयना- 2
 जैनेन्द एकटा महाग्रन्थ लिखने छथि - समय और हम। मोनमे अबैत अछि, समय तँ हमरहुसँ गुजरल अछि । एकटा निश्चित तिथिकेँ जे प्रकट भेल से समयसँ बाहर जाएत कतए? आ कालेक एकटा निश्चित अवधिमे तिरोहितो भऽ जाएत । मतलब जे समयसँ मुक्त क्यो नै अछि । अवतारो नै, मसीहो नै । हम तँ कहब जे कालदंशे व्यक्तिकेँ भाववाचकताक अभिव्यक्ति दैत छैक, ‘त्वजोड़ि कऽ ।

जे-से । मुदा ई अधिक काल होइत रहैत अछि जे मैथिलीक ओ कोन दंश थिक जे हमर अनन्य घूमकेतुकेँ प्रकट केलकनि, आ हमरा व्यक्तिकेँ एकटा त्वदऽ देलक। कथा-कविता तँ नै आ जे बहुत गम्भीर आलेख तँ सैकड़ो प्रस्तुत केने हएब । मुदा ओ सभ हमर थिक, घूमकेतुक नै थिकनि, घूमकेतुक त्वहमरासँ प्रखर छनि । मुदा डंक तँ हमरे लागल अछि । की थिक ओ?

रोटी कमा लैक लेल जे भाषा सहयोग देलक से हँसी लागत, अंग्रेजी रहल अछि । लीखि-बाजि लेबाक लूरि मजबूरी ।

 तखनि? मैथिलीक ई दंश? आ जहर आपादमस्तक व्याप्त? हमरा लागल एकर उत्स, कतौ ने कतौ कालप्रवाहमे अवश्य हेबाक चाही ।

मधुबनी शहरमे लघुसिंचाई योजनक जे ऑफिस छैकततएसँ लऽकऽ करीब-करीब पुल [पृ.-54]धरि टटघरमे स्थापित एकटा प्रेस छलैक, ‘मैथिल प्रिंटिंग वर्क्स। आइ कहि सकै छी जे ओकर  व्यवस्थापक हमर पिता छला । ताइ दिन नै बुझियै, ओ की छला, मुदा जे लोक आबनि, ताहिमे मैथिलीयो किताब छपाबैबला रहथि । स्वाभाविक छलै, जे-जे खिस्सा-पिहानी छपै, से एक प्रति हमरा माताकेँ उपलब्ध भऽ जाइनि । गोनू झाक चुटुक्का गोनू विनोदनामसँ छपल छलनि । प्रायः तीन कि चारि भागमे । दुपहरियामे ओकर परायण समय काटबाक पारिवारिक शगल रहैक, प्रायः ई पहिल दंश हो । कारण प्रारम्भिक प्रतिक्रिया हमरो यैह छल जे मैथिली हास्य-विनोदक द्वारा सरकारक मनोरंजनक अतिरिक्त आर किछु करबा जोग नै अछि । ताहि दिन ओही प्रेससँ माधवी-माधवछपल छलैक । हमरा मोन अछि, नायिकाकेँ अपहृत करैक चेष्टासँ पूर्व ओकरालोकनिक वार्त्तालाप हमर बहीनसभ बरमहल दोहरबैत रहथिन ।

अपना होइए जे ओइ दिनमे तँ बड़ नेना रही । हमर पिता पोन परक कलकलि कार्बोलिक साबुनसँ धो देता, ताहि लेल हुनका बहुत परिश्रम करबियनि । तखन फेर ई उपन्यास? मैथिली? ओना हमरा बुझने दंश ओही बएसक सभसँ कड़गर होइ छैक । तत्काल बोध नै हो, से बात फूट ।  हमरा तँ लगैत अछि जे राज स्कूलमे भर्ती भेलाक बाद मैथिलीक दोसर दंश कतौ अही लेल ने कहीं बेसी व्यापने होअए जे ओकरा प्रेसबला कालक जहरकेँ मात्र पुनः सक्रिय करऽ पड़लैक । राज स्कूलक वातावरण मैथिली केन्द्रित छलैक । ओकर प्रधानाध्यापककेँ हिन्दियो ने बाजऽ अबैन । ओना ताइ दिन स्कूलिंग केर प्रयास तँ सभ स्कूलमे रहै मुदा जाहि कालक राज स्कूलक चर्चा हम कऽ रहल छी, तकर जोड़ा नै रहै । ओइ स्कूलमे स्वभावतः राजसँ सम्पर्कित व्यक्तिक वार्डकेँ स्थान भेटैक, डिस्टिक बोर्डक मिडिल परीक्षाक सर्टिफिकेटक आधारपर । मायानन्द मिश्रजी छला, हमरालोकनिसँ बड़ सिनियर । संयोगात द्वितीय श्रेणीमे उत्तीर्ण भऽ गेला । विद्यालय त्यजन प्रमाण-पत्र हुनका पठा देल गेलनि, कैम्पसमे नै प्रवेश  पाबि सकला ।  ऑफिस एबाक चर्चा कोन! स्वैच्छिक-शैक्षिक अनुशासनक दृष्टिसँ एन.के. घोष सनक शिक्षक देखल नै ।

मैथिलीक मादे कहैत छलौं जे मैथिली स्वैच्छिक वातावरणक केन्द्रमे छलै । दरभंगा राजक दिससँ मैथिली भाषा-साहित्यक हेतु पटना विश्वविद्यालयमे रमेश्वर चेयरकऽ देल गेल छलैक । आठवाँ वर्गमे मैथिली, संस्कृतक विकल्प रूपमे स्वीकृत भऽ गेल छलैक । पं. जयदेव मिश्र, चं.मि. महाविद्यालयमे मैथिलीक व्याख्याता नियुक्त छला । पाठ्यपुस्तक दारिद्र्य-बोध उपस्थित छलैक । आ अइ समस्त वातावरण बीच शलाका-पुरुषक रूपमे छला - स्वनामधन्य कुमार श्री गंगानन्द सिंह । गणेशकेँ मैथिलीमे लम्बोदर कही कि गजानन, ताहिपर विवाद चलैक । योगा बाबू भलमानुसक पहिल प्रति लऽकऽ ओतहि उपस्थित भेल छला । गुरुवर अमरजीक गुदगुदीछपि कऽ ओत्तहि पहुँचल   छलनि । भांगपीने शेरमशेर भुअंकर त्रिपुंड, बहुत प्रखर जनौं, मुदा भुवनमोहिनी मुसकानबला फोटो फाइन आर्ट कॉटेजसँ बनि कऽ ब्लॉक बनैसँ पूर्व ओतहि प्रदर्शित भेल छलैक । बगलमे राजक विशाल पुस्तकालय, जाहिमे पंडित प्रवर रमानाथ झा जीक साधना । सात दिनपर एकटा कऽ मैथिली रचना नेने प्रकट होमऽबला राजगजटअर्थात् मिथिला-मिहिरसेहो, कम काल नै, वातावरणकेँ उद्वेलित कऽ जाइ । स्वनामधन्य सम्पादक पंडित हीरानन्द झा शास्त्रीक धुनिञाक खोजजहिया छपि कऽ आएल छलैक, प्रायः एक बेर कऽ सभ पढ़ने होएत ।

जाहि समयक चर्चा कऽ रहल छी - 42क आन्दोलनक झमाड़ अंग्रेजी राजकेँ हिला देने छलैक । सम्भव थिक, युद्धकालमे लागल छलैक, तेँ बेसम्हार भेल होइ । कुमार गंगानन्द सिंह हिन्दू महासभाक प्रान्तीय अध्यक्ष छला । तेँ हिन्दी-हिन्दू-हिन्दुस्तानबला वातावरण सभसँ मुखर छलैक । राजा राधिकारमण प्रसाद सिंह, कामेश्वर सिंह मस्तआदिकेँ पाँच दिन आबि कऽ रहबाक अवसर होइनि, शिवपूजन सहाय, रामधारी सिंह दिनकर’, पं0 जगन्नाथ मिश्र, प्रिंसिपल बी.एन.ए. सिन्हा  हिन्दी-हिन्दू-हिन्दुस्तानबला गोष्ठीक रत्न छला । मुदा ओइ कालसँ निःसृत एकटा आवश्यकताक रूपमे मैथिली एलै आ पूरा राज्यकेँ एहि बातक चिन्ता भेलै जे मैथिलीकेँ, ओकरा बढ़ाकऽ राखब चाहैत  छलैक । तेँ, मिथिला-मैथिल-मैथिली सेहो ओही सचिव-सदन मे रूप लैत छलैक । प्रभाव [शेषांश पृ.-62]आ हाथ रमानाथ बाबूक छलनि । कॉलेजक छात्र-संघो की करितय? सी.एम. कॉलेजमे पढ़ाइ छल - एकटा मात्र छात्र छल । स्मृतिसँ कहऽ कही तँ हम कहि सकै छी जे हिन्दी-हिन्दू- हिन्दुस्तान तुराइए तर पता नै कखनि हमरा ई जहर व्यापल । सम्भव थिक, प्रतिक्रिया भेल हो । मुदा हमरालोकनि एकटा अखिल भारतीय शिशु मैथिली साहित्य सम्मेलनक पहिल अधिवेशन मधुबनीमे कऽ छोड़ल ।
________________
स्रोत
मिथिला विभूति पर्व स्मारिका  (भोलालाल दास आ धूमकेतु पर केन्द्रित)  तेसर विशेषांक
हैदराबाद सिकन्दराबाद, 14 मइ2017
संपादक- चन्द्रमोहन कर्ण
प्रकाशक : देसिल बयना मैथिली साहित्य मंच,  हैदराबाद-सिकन्दराबाद